राजस्थान | न्यूज़ डेस्क |लै मेरा पुत्त मुंह मिट्ठा कर, दही खा एह शगन हुँदा है,रब पेपर चंगा करुगा और सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देने लगी।दूर दराज मेवाड़ क्षेत्र से आये बच्चों को पहले तो पंजाबी समझ नही आई।जब बताया तो भावुक हो गए और पांव छू बागड़ी भाषा मे बोले माता इतना प्यार और स्नेह जो गुरद्वारे में मिला है ताउम्र याद रखेंगे कि हम सच मे एक आध्यात्मिक के केंद्र में आये हैं जहां देव रूहें मिली इसी लय और बस भावनायों में बोलते ही चले गए ।
भाषा बीबियों को समझ नही आ रही थी बस बच्चों की आंखों के भीगे कोर एक मां बेटे के रूहानी रिश्ते का चित्रण कर रहे थे। वातावरण एक अनजाने से रिश्ते से महक रहा था। एक एक बच्चे को दही खिला गुरद्वारा साहिब में अरदास कर विदा किया। सच मे ये प्यार, मोहब्बत और रूहानी इश्क गुरुनानक के घर की रहमत है जहां आने वालों को सिर्फ चार रोटियां ही नही खिलाते बल्कि अपनत्व,सांझ,भाईचारा और गुरु साहिब की शिक्षाएं भी बांटते है फिर वो माहौल बनता है जिसके बारे में गुरु साहिब कहते है "सभै साँझीवाल सदायन तू कोए न दिसै बाहरा जीओ"