रीवा। समशेर सिंह गहरवार। इस दौर में अक्सर देखा जा रहा है कि 40 की उम्र पूरा करते-करते लोग ओस्टियो अर्थराइटिस जिसे हिंदी में संधि बात कहते हैं। अधिकांश लोग शिकार होते जा रहे हैं कहीं कोहनी का दर्द गांठ दर्द घुटने का दर्द सहित अन्य जगह के दर्द से पीड़ित हैं। चिकित्सकों की राय अनुसार ऐसी बीमारी कैल्शियम की कमी से होती जा रही है। अगर बीमारी के प्रकोप से बचाना है तो सभी लोगों को अपने आहार और बिहार में ध्यान देना पड़ेगा।
अन्यथा बीमारी से राहत नहीं मिल पाएगी और एक दिन ऐसा आएगा की बढ़ती उम्र में चलने में भी असमर्थता होगी। दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा। अतः बीमारी से बचाना है तो रोगी बढ़ती उम्र के साथ अपना वजन घटाएं कैल्शियम युक्त आहार लें सुबह की अच्छी तरह से धूप लें हरी सब्जियों का सेवन करें जरूरत पड़ने पर चिकित्सक से सलाह अवश्य लें। चिकित्साक के परामर्श अनुसार ही दर्द निवारक गोली का इस्तेमाल करें अन्यथा इससे कई प्रकार की बीमारियां हो सकती है।
घुटनों का दर्द सबसे ज्यादा खतरनाक
घुटनों का दर्द ऐसा होता है कि उठने बैठने तक में भी असहनीय दर्द का एहसास होता है। वजह है की बढ़ती उम्र के साथ घुटने के अंदर कार्टिलेज में एक प्रकार का द्रव्य भरा होता है। जो घुटनों को चिकनाहट प्रदान करता है तब तक आदमी स्वस्थ रहता है। बढ़ती उम्र के साथ यही द्रव्य धीरे धीरे सूखने लगता है। और लोग संधिवात के मरीज हो जाते हैं। क्योंकि सायनोललियल द्रव्य सूखने से दोनों साइड के घुटनों की हड्डियां आपस में टकराकर गिसने लगती हैं और असहनीय दर्द का एहसास कराती है। यहां तक की संधि बात के मरीज को बैठने उठने और चलने -फिरने में खासा दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
ठीक हुए कई रोगी
रीवा जिले के निपानिया मोहल्ले में स्थित आयुर्वेद चिकित्सा एवं शिक्षा महाविद्यालय में पदस्थ वरिष्ठ चिकित्सक डॉक्टर राजीव अग्निहोत्री की माने तो। उनके पास अर्थराइटिस के मरीज बहुत सारे आ चुके हैं और आयुष इलाज से ठीक भी हो चुके हैं। डॉक्टर अग्निहोत्री का कहना है कि जोड़ों का दर्द 40 की उम्र के बाद ही अधिकांश लोगों को शुरू होता है लेकिन दर्द निवारक गोली खाकर मर्ज को और बढ़ाते रहते हैं? उनका कहना है कि शरीर के किसी भी हिस्से में जोड़ों के दर्द को हल्के में ना लें और चिकित्सक के परामर्श के बाद ही किसी भी दवा का सेवन करें।
उन्होंने बताया कि आयुष इलाज जोड़ों के दर्द में बहुत ज्यादा फायदा पहुंचता है। महज 4- 6 महीने के इलाज और परहेज से ही मरीज ठीक हो जाते हैं। उन्होंने दावा करते हुए बताया कि अब तक अपने चिकित्सकीय कार्यकाल में हजारों मरीजों को ठीक कर चुके हैं जो अब खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं।