नई दिल्ली | आकांशा त्रिपाठी | दालचीनी और बेरी से बनी दवा से दर्द व संक्रमण दूर किया जा सकेगा। वैज्ञानिक दवा का ट्रायल कर रहे हैं। यह ट्रायल सिस्टाइटिस नाम की बीमारी के लिए किया जा रहा है। इस बीमारी से सबसे ज्यादा महिलाएं जूझती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है, नई दवा से संक्रमण के लिए जिम्मेदार ई-कोली और दूसरे बैक्टीरिया को इंफेक्शन फैलाने से रोका जा सकेगा।
कैसी है यह दवा, कैसे काम करती है और क्या है सिस्टाइटिस जिससे सबसे ज्यादा महिलाएं जूझती हैं, जानिए इन सवालों के जवाब
दवा क्या है और कैसे काम करती है, पहले इसे समझें
दवा को दालचीनी, बेरी और हेल्दी बैक्टीरिया के साथ मिलाकर तैयार किया गया है। आसान भाषा में समझें तो बैक्टीरिया के शरीर पर पी-फिम्ब्री नाम की संरचना पाई जाती है। इसी की मदद से बैक्टीरिया इंसान की यूरिनरी ट्रैक्ट की दीवार पर अपनी पकड़ मजबूत बनाता है। नतीजा, यह धीरे-धीरे संक्रमण को बढ़ाता है।
नई दवा इसी पी-फिम्ब्री संरचना को टार्गेट करती है और बैक्टीरिया अपना संक्रमण नहीं फैला पाता। दालचीनी में मौजूद ट्रांस-सिमेल्डिहाइड और बेरी में मौजूद रसायनिक तत्व बैक्टीरिया को यूरिनरी ट्रैक्ट में टिकना मुश्किल कर देते हैं। इस तरह संक्रमण को बढ़ने से रोक लिया जाता है।
वहीं, दवा में मौजूद शरीर को फायदा पहुंचाने वाला बैक्टीरिया ब्लैडर वॉल की इम्यून कोशिकाओं की रक्षा करने का काम करता है।
क्या है सिस्टाइटिस, नई दवा जिसका इलाज करेगी
मूत्राशय (ब्लैडर) में सूजन और जलन को ही सिस्टाइटिस कहते हैं। ज्यादातर मामलों में इसकी वजह बैक्टीरिया का संक्रमण होता है। यह संक्रमण जब ब्लैडर से किडनी तक पहुंच जाता है तो हालत और गंभीर हो जाती है।आमतौर पर इसका इलाज एंटीबायोटिक्स दवाओं से किया जाता है।
बार-बार पेशाब महसूस होना, इससे तेज गंध आना, पेशाब के दौरान दर्द या जलन होना इसके आम लक्षण हैं। पीठ के एक तरफ दर्द और बुखार जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं। ऐसा होने पर डॉक्टरी सलाह लेने को कहा जाता है।
क्यों 60 फीसदी तक महिलाएं इससे जूझती हैं?
रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, 50 से 60 फीसदी महिलाएं जीवन में कभी न कभी सिस्टाइटिस जैसे इंफेक्शन से जूझती हैं। महिलाओं में इसके सबसे ज्यादा मामले क्यों सामने आते हैं उसकी भी एक वजह है।
दरअसल, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में मूत्रमार्ग छोटा होता है। इसलिए बैक्टीरिया के लिए ब्लैडर तक पहुंचाना आसान हो जाता है। संक्रमण होने पर मरीज थके हुए से दिखते हैं।
बैक्टीरिया के अलावा डायरिया और मिचली में दी जाने वाली दवाएं भी इसकी वजह हो सकती हैं। इलाज के दौरान मरीज को एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं, लेकिन धीरे-धीरे बैक्टीरिया पर बेअसर हो रहीं ये दवाएं इलाज को मुश्किल बनाने का काम कर रही हैं।
पेरिस में चल रहा नई दवा का ट्रायल
शुरुआती दौर के क्लीनिकल ट्रायल में यह दवा असरदार साबित हुई है। इसके बाद नई दवा का ह्यूमन ट्रायल पेरिस के अल्फ्रेड फोर्नियर इंस्टीट्यूट में 18 से 65 साल की 80 महिलाओं पर चल रहा है। ये ऐसी महिलाएं हैं जो पिछले 6 महीने में कम से कम दो बार सिस्टाइटिस से जूझ चुकी हैं।
ट्रायल में शामिल महिलाओं को दिन में दो बार एक-एक गोली दी जा रही है। करीब 6 महीने तक ट्रायल में दवा लेने वाली और न लेने वाली महिलाओं के समूहों की तुलना की जाएगी। इसके बाद रिजल्ट जारी किए जाएंगे।
ब्रिस्टल यूरोलॉजी एसोसिएट्स के कंसल्टेंट यूरोलॉजिस्ट प्रो. राज प्रसाद कहते हैं, नई थैरेपी बैक्टीरिया को ब्लैडर की दीवार छोड़ने पर मजबूर करेगी।