मुंबई | न्यूज़ डेस्क | राजपाल यादव इस वक्त पर्सनल लाइफ में अपनी प्रफेशनल लाइफ की वजह से जिंदगी के उस मोड़ पर आ चुके हैं, जहां आना कोई पसंद नहीं करता। हालात, ऐसे हुए कि उन्हें जेल में सरेंडर करना पड़ा है। हालांकि, उनके इस हाल के पीछे जो फिल्म है, आज हम यहां उसके बारे में कुछ ऐसी बातें बताने जा रहे हैं, जो हो सकता है आपने पहले न सुना हो। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि ये फिल्म साल 2012 में आई 'अता पता लापता' थी, जिसे बनाने में राजपाल यादव ने अपना सबकुछ झोंक दिया और अब वो सड़क पर आ गए हैं। आइए, जानते हैं राजपाल यादव के गले फांस बन चुकी इस फिल्म को वो क्यों बनाना चाहते थे और क्या थी इसकी कहानी।
कॉमेडियन ने फिल्म को लेकर एक बार अपने प्रोडक्शन के यूट्यूब चैनल पर दिल खोलकर बातें की थीं। राजपाल यादव ने बताया था कि ये फिल्म 'अता पता लापता' एक अलग तरह का प्रयोग है, जो काफी सरल है। उन्होंने बताया था कि इस फिल्म में 2-4 कलाकार नहीं बल्कि 170 कलाकार हैं। राजपाल ने ये भी कहा था कि ये अपने तरह की ऐसी पहली फिल्म है जिसके सामने है म्यूजिक है और बैकग्राउंड में ड्रामा है।
'लगा अर्थपूर्ण, उद्देश्यपूर्ण और मनोरंजक सिनेमा बना सकूं'
उन्होंने कहा था, 'इसमें कोई आपको बॉलीवुड का डायरेक्टर नहीं मिलेगा, कोई हॉलीवुड का डायरेक्टर नहीं दिखेगा। ये एक ऐसा देसी ब्रॉड वे है। मुझे लगता है कि 10-12 साल हमने दो-दो, तीन-तीन शिफ्ट में काम किया, 25 साल हो गए हमें नुक्कड़, गली में, प्रोसिनियम में अभिनय करते-करते। दिमाग में यही आया था कि एक ऐसा अर्थपूर्ण, उद्देश्यपूर्ण और मनोरंजक सिनेमा बना सकूं। तो अता पता लापता उसी की एक नई कड़ी है जो हमने पेश करने की कोशिश की है।'
पहली बार फोर ग्राउंड में म्यूजिक और बैकग्राउंड में ड्रामा'
राजपाल यादव ने आगे कहा था, 'टाइम आया और वो ऐसी फिल्म थी कि मुझे लगता है कि अगर मैं 4-5 साल भी घूमता लोगों को प्रड्यूस करने के लिए तो उसको कोई नहीं करता। उसमें सब 170 कलाकार हैं, थिएटर के हैं, 10-15 ऐसे लोग हैं हमारे जैसे जो हर दूसरी-तीसरी फिल्म में काम करने का सौभाग्य पा जाते हैं। एक तो वो फिल्म बड़ी बजट की फिल्म है। बहुत सारी प्रफेशनल, व्यवसायिक, टेक्निकल चीजों में डिस्कशन करते तो हमें नहीं लगता कि वो कोई प्रड्यूस करता। पहली बार फोर ग्राउंड में आपको म्यूजिक दिखेगा और बैकग्राउंड में ड्रामा दिखेगा। तो इसको मैं किस डायरेक्टर को कहूं कि वो पूरी फिल्म बनाए।'
200-300 बार इसको अपने दिमाग में ही पकाया'
उन्होंने आगे कहा था, 'चूंकि ये हमारे दिमाग की ऊपज थी, इसको बनाने से पहले, स्क्रिप्ट लिखने से पहले जब आइडिया आया था तो 200-300 बार इसको अपने दिमाग में ही पकाया था। फिर धीरे-धीरे इसको कागज पर लाना शुरू किया। मुझे लगा कि 4-5 साल अपनी फिल्म लेकर घूमूं, अपना टाइम बर्बाद करूं तो अगर फिल्म हमारे दिमाग की ऊपज है, एक मोहम्मद सलीम जी का आइडिया है, उसको हम चार लोगों ने स्क्रीनप्ले डायलॉग में तब्दील किया और ये फिल्म बनाने का निर्णय ले लिया।'