मुंबई | हस्तरेखा तज्ञ विनोद जी | प्रिय बन्धुओं ! सभी नर , नारी अपनी सुंदरता हेतु काफी चिंतित रहते हैं , औऱ इसके लिए सब लोग सामान्य स्नान आदि से आगे बढ़कर भी नाना प्रकार के प्रयोग कर अपने चेहरे , शरीर , वस्त्र आदि को अतिशय सुंदर बनाने में प्रयत्न शील बने रहते हैं । फिर भी किसी दूसरे को किसी दृष्टि से सुंदर , हैंडसम , ब्यूटीफुल देखकर आत्म ग्लानि से भर जाते हैं , और फिर स्वयम उससे सुंदर दिखने के लिए और अन्य कृत्रिम प्रयास करने लग जाते हैं | यह चक्र सतत चलता रहता है , लेकिन उनमें सच्चा सौंदर्य , आकर्षण पैदा नहीं हो पाता ।
इसका मूल कारण कुछ और है ।
हमें कोई भी व्यक्ति इसलिए आकर्षक नहीं लगता कि उसने अनेकानेक उपचार , तेल पावडर , सज्जा कर रखी है , हमें कोई भी नर , नारी क्यों आकर्षक लगता है..इसे एक संस्कृत कवि ने कितना सुंदर , व सत्य रूप में व्यक्त किया है ..??
केयूराः न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला:।
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजा:।
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते।
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥
हिन्दी व्याख्या
- बाजूबन्द/केयूर, पुरुष की शोभा नहीं बढ़ाते और ना ही चन्द्रमा के समान उज्जवल हार ,न स्नान,न चन्दन का लेप,न फूल और ना ही सजे हुए केश ही शोभा बढ़ाते हैं।
केवल सुसंस्कृत वाणी ही उसके व्यक्तित्व की वास्तविक शोभा बढ़ाती है।
साधारण आभूषण नष्ट हो जाते हैं परन्तु वाणी का आभूषण सतत रहने वाला है।
आओ हम बाहरी सजावट के स्थान पर अपनी वाणी , व्यवहार , आचरण को सुंदर बनायें और सबके लिए आकर्षक बनें..
सस्नेह जय श्रीकॄष्ण