December 18, 2021

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अंधविश्वास के चलते लोग कांटो पर लेट कर देते हैं परीक्षा : ‘पांडवों के वंशज’, अनूठी परंपरा




मध्य प्रदेश | न्यूज़ डेस्क | एक गांव में अंधविश्वास की परम्परा के चलते लोग इक्कीसवीं सदी में भी कांटो पर लेट कर परीक्षा देते है | यहां आज भी आस्था के नाम पर एक दर्दनाक खेल खेला जा रहा है | अपने आप को पांडवों का वंशज कहने वाले रज्जड़ समाज के लोग अपनी मन्नत पूरी कराने और बहन की विदाई करने के लिए खुशी-खुशी कांटों की सेज पर लेटते हैं | बैतूल के सेहरा गांव में हर साल अगहन मास पर रज्जड़ समाज के लोग इस परंपरा को निभाते हैं | इन लोगों का कहना है कि हम पांडवों के वंशज हैं | पांडवों ने कुछ इसी तरह से कांटों पर लेटकर सत्य की परीक्षा दी थी इसीलिए रज्जड़ समाज इस परंपरा को सालों से निभाता आ रहा है |

कांटों की सेज पर लेटकर वो अपनी आस्था, सच्चाई और भक्ति की परीक्षा देते हैं | ऐसा करने से भगवान खुश होते हैं और उनकी मनोकामना भी पूरी होती है | इसके अलावा यह भी मान्यता है कि इस कार्यक्रम के बाद वे अपनी बहन की विदाई करते है | रज्जड़ समाज के ये लोग पूजा करने के बाद नुकीले कांटों की झाड़ियां तोड़कर लाते हैं और फिर उन झाड़ियों की पूजा की जाती हैं | इसके बाद एक-एक करके ये लोग नंगे बदन इन कांटों पर लेटकर सत्य और भक्ति का परिचय देते हैं |

पांडव भी लेटे थे कांटो पर इस मान्यता के पीछे एक कहानी यह है कि एक बार पांडव पानी के लिए भटक रहे थे | बहुत देर बात उन्हें एक नाहल समुदाय का एक व्यक्ति दिखाई दिया | पांडवों ने उस नाहल से पूछा कि इन जंगलों में पानी कहां मिलेगा, लेकिन नाहल ने पानी का स्रोत बताने से पहले पांडवों के सामने एक शर्त रख दी |

नाहल ने कहा कि, पानी का स्रोत बताने के बाद उनको अपनी बहन की शादी भील से करानी होगी | पांडवों की कोई बहन नहीं थी इस पर पांडवों ने एक भोंदई नाम की लड़की को अपनी बहन बना लिया और पूरे रीति-रिवाजों से उसकी शादी नाहल के साथ करा दी | विदाई के वक्त नाहल ने पांडवों को कांटों पर लेटकर अपने सच्चे होने की परीक्षा देने का कहा | इस पर सभी पांडव एक-एक कर कांटों पर लेटे और खुशी-खुशी अपनी बहन को नाहल के साथ विदा किया |

यह कार्यक्रम पांच दिन तक चलता | इसलिए रज्जड़ समाज के लोग अपने आपको पंड़वों का वंशज कहते हैं और कांटों पर लेटकर परिक्षा देते हैं | परंपरा पचासों पीढ़ी से चली आ रही है, जिसे निभाते वक्त समाज के लोगों में खासा उत्साह रहता है | ऐसा करके वे अपनी बहन को ससुराल विदा करने का जश्न मनाते हैं | यह कार्यक्रम पांच दिन तक चलता है और आखिरी दिन कांटों की सेज पर लेटकर खत्म होता है |

वहीं इस प्रथा को लेकर डॉ रानू वर्मा का कहना है कि ऐसे नंगे बदन कांटों पर लेटना किसी भी लिहाज से सही नहीं है | इससे गंभीर चोट लग सकती है और कई तरह के संक्रमण और बैक्टिरियल इंफेक्शन हो सकते हैं और इससे किसी की जान भी जा सकती है |




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सोनम कौर भाटिया

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