नई दिल्ली | न्यूज़ डेस्क | मनुष्य के जीवन में धन, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक सुविधाओं का अपना महत्व है, लेकिन यदि मन शांत नहीं है तो ये सारी उपलब्धियां फीकी पड़ जाती हैं। स्वस्थ शरीर जीवन को शक्ति देता है, जबकि स्वस्थ मन जीवन को सही दिशा देता है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्ति की निजी चिंता नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के स्वस्थ भविष्य से जुड़ा विषय है।
10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना, मानसिक समस्याओं को लेकर व्याप्त भ्रांतियों और संकोच को दूर करना तथा आवश्यकता पड़ने पर समय रहते सहायता लेने के लिए लोगों को प्रेरित करना है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। सर्वोच्च न्यायालय ने 25 जुलाई 2025 को सुकदेब साहा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में मानसिक स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग माना। यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि गरिमापूर्ण जीवन का अर्थ केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक गरिमा की रक्षा भी है।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह अधिनियम मानसिक बीमारी से जूझ रहे व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और गरिमापूर्ण उपचार पर बल देता है। अधिनियम में आत्महत्या के प्रयास से संबंधित कानून में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया तथा गंभीर तनाव की स्थिति में व्यक्ति को सहायता और उपचार उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया।
बढ़ती इच्छाएं और घटता संतोष
आज का युग भौतिक प्रगति का युग है। मनुष्य के पास सुविधाएं पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन मानसिक शांति उतनी ही सहजता से उपलब्ध नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है, अधिक प्राप्त करना चाहता है और दूसरों से बेहतर दिखाई देना चाहता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब अपेक्षाएं वास्तविकता से बहुत आगे निकल जाती हैं। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। फिर तीसरी और चौथी। यह क्रम चलता रहता है। जब मनुष्य अपनी उपलब्धियों की तुलना दूसरों की उपलब्धियों से करने लगता है तो असंतोष और तनाव बढ़ने लगता है। संत कबीरदास जी का प्रसिद्ध दोहा आज के जीवन में विशेष रूप से प्रासंगिक है—
“गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान। जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान॥”
कबीरदास जी ने सदियों पहले बता दिया था कि वास्तविक संपत्ति केवल भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि संतोष में है। जिसके भीतर संतोष है, वह सीमित साधनों में भी सुखी रह सकता है; और जिसके भीतर असंतोष है, वह अपार संपत्ति के बावजूद बेचैन रह सकता है।
अवसाद को समझना जरूरी
अवसाद केवल उदासी का दूसरा नाम नहीं है। लंबे समय तक बनी रहने वाली उदासी, निराशा, किसी कार्य में रुचि समाप्त होना, आत्मविश्वास में कमी, सामाजिक गतिविधियों से दूरी और दैनिक कार्यों में कठिनाई इसके संकेत हो सकते हैं। मानसिक परेशानी को छिपाना समस्या का समाधान नहीं है। जिस प्रकार शरीर में बीमारी होने पर चिकित्सक से परामर्श लिया जाता है, उसी प्रकार मानसिक परेशानी होने पर मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से सहायता लेना भी सामान्य स्वास्थ्य देखभाल का ही हिस्सा है। दुर्भाग्य से आज भी मानसिक बीमारी को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां हैं। कई लोग मानसिक परेशानी को कमजोरी समझते हैं। यही सोच समस्या को और गंभीर बना देती है। हमें यह समझना होगा कि मानसिक बीमारी कमजोरी नहीं, स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति है और समय पर सहायता मिलने पर व्यक्ति सामान्य जीवन की ओर लौट सकता है।
विद्यार्थियों का तनाव गंभीर चिंता
आज विद्यार्थियों पर पढ़ाई, प्रतियोगिता, परीक्षा, करियर और भविष्य को लेकर अत्यधिक दबाव है। माता-पिता की अपेक्षाएं और समाज में बढ़ती प्रतिस्पर्धा कई बार बच्चों के मन पर भारी पड़ती हैं। ऐसे में केवल यह पूछना कि “कितने अंक आए?” पर्याप्त नहीं है। कभी यह भी पूछना चाहिए—“तुम कैसा महसूस कर रहे हो?” बच्चे की तुलना दूसरे बच्चे से करने के बजाय उसकी क्षमता और रुचि को समझना चाहिए। हर विद्यार्थी की प्रतिभा अलग होती है। किसी की रुचि विज्ञान में हो सकती है तो किसी की साहित्य, कला, खेल, इतिहास या किसी अन्य क्षेत्र में। सफलता का केवल एक ही रास्ता नहीं होता। माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में अचानक आए परिवर्तन को गंभीरता से लेना चाहिए। यदि कोई बच्चा लगातार चुप रहने लगे, अत्यधिक तनाव में दिखाई दे, पढ़ाई या अपनी पसंदीदा गतिविधियों से दूरी बनाने लगे अथवा निराशा की बातें करे तो उसे डांटने के बजाय प्रेमपूर्वक सुनना चाहिए। कभी-कभी किसी व्यक्ति को समाधान से पहले केवल एक संवेदनशील श्रोता की आवश्यकता होती है।
मोबाइल की दुनिया और अकेलापन
तकनीक ने जीवन को सरल बनाया है, लेकिन इसके अत्यधिक उपयोग ने नई चुनौतियां भी पैदा की हैं। मोबाइल और सामाजिक माध्यमों ने लोगों को आभासी रूप से जोड़ दिया है, परंतु कई बार व्यक्ति वास्तविक जीवन में अधिक अकेला होता जा रहा है। दूसरों के जीवन की चमक-दमक देखकर स्वयं को कमतर समझना, लगातार तुलना करना और हर समय आभासी संसार में व्यस्त रहना मानसिक तनाव को बढ़ा सकता है। इसलिए तकनीक का उपयोग करें, लेकिन तकनीक को अपने जीवन का स्वामी न बनने दें। परिवार के साथ बैठकर भोजन करना, प्रकृति के बीच समय बिताना, नियमित व्यायाम करना, योग और प्राणायाम करना, पर्याप्त नींद लेना तथा अपने मन की बात किसी विश्वसनीय व्यक्ति से साझा करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी आदतें हैं।
नशा समस्या का समाधान नहीं
मानसिक तनाव और निराशा की स्थिति में कुछ लोग नशे को सहारा समझने लगते हैं। लेकिन नशा समस्या को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसे और गहरा कर देता है। नशा व्यक्ति के शरीर, मस्तिष्क, परिवार और सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य और नशामुक्ति को अलग-अलग विषय मानना उचित नहीं होगा। स्वस्थ मन के लिए नशे से दूरी आवश्यक है। नशे की ओर नहीं, जीवन की ओर बढ़ना होगा।
तृष्णा पर विजय ही वास्तविक संतोष
श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड में हनुमान जी और सुरसा का प्रसंग जीवन के लिए अत्यंत सुंदर संदेश देता है। हनुमान जी ने परिस्थिति के अनुसार अपना रूप छोटा किया और मार्ग पार कर लिया। जीवन में हमारी तृष्णाएं भी सुरसा के समान बढ़ती जाती हैं। यदि इच्छाओं का आकार निरंतर बढ़ता रहे तो मनुष्य के लिए संतोष पाना कठिन हो जाता है। इसलिए जीवन में आगे बढ़ने के साथ-साथ यह भी सीखना होगा कि कहां रुकना है, कितना चाहिए और किस बात के लिए संतुष्ट होना है।
एक पंजाबी कवि की पंक्तियां भी जीवन की इसी सच्चाई को व्यक्त करती हैं—
“बंदे दी आसां कदे हुंदियां न पूरियां,
तड़पदा बहुतेरा, फिर वी रहंदियां अधूरियां।”
मनुष्य की इच्छाएं अनंत हैं। इसलिए वास्तविक सुख इच्छाओं को अनंत बढ़ाने में नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने में है।
सेवा और परमार्थ से मिलता है मानसिक संतोष
भारतीय संस्कृति ने सदैव परमार्थ का मार्ग दिखाया है। रक्तदान, वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण, जरूरतमंदों की सहायता, नशामुक्ति के लिए जागरूकता और समाजसेवा जैसे कार्य व्यक्ति को आत्मसंतोष प्रदान करते हैं। जब हम किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं तो हमारे भीतर भी सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही कारण है कि सेवा केवल समाज का कल्याण नहीं करती, बल्कि सेवाभावी व्यक्ति के मन को भी समृद्ध करती है। मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए हमें एक ऐसा समाज बनाना होगा जहां व्यक्ति अपनी परेशानी बताने में संकोच न करे, जहां मानसिक बीमारी का उपहास न उड़ाया जाए और जहां सहायता मांगने वाले व्यक्ति को कमजोरी नहीं, बल्कि साहस की दृष्टि से देखा जाए।
मन की सुनिए, मन की संभालिए
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस केवल एक दिन मनाने का अवसर नहीं है। यह अपने जीवन की दिशा पर विचार करने का अवसर है। हमें स्वयं से पूछना चाहिए—क्या हम अपने शरीर की तरह अपने मन का भी ध्यान रखते हैं? क्या हम अपने बच्चों की बात सुनते हैं? क्या हम अपने परिवार के किसी परेशान सदस्य के साथ बैठते हैं? क्या हम अपने मित्र की चुप्पी को समझने का प्रयास करते हैं? आइए, इस अवसर पर हम संकल्प लें कि स्वयं भी मानसिक रूप से स्वस्थ रहने का प्रयास करेंगे और अपने आसपास के लोगों को भी अकेला नहीं पड़ने देंगे। तनाव, अवसाद या किसी गंभीर मानसिक परेशानी की स्थिति में विशेषज्ञ सहायता लेने में संकोच नहीं करेंगे।
क्योंकि—
स्वस्थ शरीर जीवन को शक्ति देता है, स्वस्थ मन जीवन को दिशा देता है और संतोष जीवन को सच्चा सुख देता है। यही स्वस्थ समाज की नींव है और यही सुखी जीवन