नई दिल्ली ।रमेश कुमार 'रिपु '। उम्मीद पर पानी फिर जाएगा। इसकी उम्मीद गुजरात लाॅबी को नहीं थी। लेकिन चार जून को आए चुनाव परिणाम से यही हुआ। मजबूरी में गठबंधन की सरकार बनाना पड़ा। अल्पमत का ठप्पा बीजेपी नेतृत्व के लिए परेशानी की बात है। नेहरू जी तीन दफा प्रधान मंत्री थे,उनकी बराबरी करना था। गुजरात लाॅबी ने बैसाखी के सहारे सरकार बना ली। संघ पहले ही चेता दिया था,कि अबकी बार बीजेपी को 220 से 240 सीट मिलेगी। फिर भी गुजराती लाॅबी सतर्क नहीं हुई।
बल्कि अहंकार में बीजेपी के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से कहलवा दिया,कि बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं है। मोदी के मंत्रीमंडल में ज्यादातर वही चेहरे हैं। एनडीए को लगा कि उन्हें भी अच्छा विभाग मिलेगा। नहीं मिला। नीतीश और चन्द्रबाबू नायडू इस उम्मीद में हैं कि उनके राज्य को विशेष पैकेज मिलेगा। गुजरात लाॅबी के तिकड़म,छल और दगाबाजी की राजनीति से नायडू वाकिफ हैं। इसलिए उन्होंने हमारा स्पीकर रहेगा का पासा फेक कर गुजरात लाॅबी को संशय में डाल दिया। राजनाथ को जवाबदारी दी गयी नायडू को मनाने की। इसलिए कि राजनाथ उदारवादी नेता हैं।
बीजेपी का स्पीकर होने पर -
राजनाथ ने नायडू से मुलाकात कर उन्हें मनाने की हर संभव कोशिश की कि बीजेपी का स्पीकर बन जानें दे।नायडू जानते हैं,बीजेपी का स्पीकर बनने का मतलब क्या है? गुजरात लाॅबी बीजपेी की संख्या 240 से 272 कैसे करेगी यह सब को पता है। वाईएसआर सीपी के चार सदस्य,आप के तीन,रालोद के दो,जद सेक्यूलर दो,एजीपी एक, एजेएसयू एक,एचएएम एक,एसकेएम एक,जदयू के 12 और टीडीपी के 24 सांसद सुरक्षित नहीं है। इनमें से कुछ दल एनडीए का हिस्सा हैं,लेकिन इससे बीजेपी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जैसा कि महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ क्या हुआ,सब जानते हैं। दरअसल संविधान की दसवीं अनुसूचि में कई छेद हैं। जिनमें छोटे दलो के सांसद फंस सकते हैं। और यह काम बीजेपी का स्पीकर आसान कर देंगे। मोदी को हर हाल में अपना स्पीकर चाहिए। ताकि संसद में विपक्ष ज्यादा सवाल न कर सके। शोर शराबा भी न कर सके। विपक्ष की आवाज को उनका स्पीकर दबा सके। सत्ता पक्ष ज्यादा मेन मेख निकाले तो उसे निलंबित कर दे। जैसा कि 2023 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने विपक्ष के एक सैकड़ा सांसदों को निलंबित कर दिया था।
मोदी एटीएम दुविधा में -
नायडू की अपनी शर्त है। उन्हें अमरावती को आन्ध्र प्रदेश की राजधानी बनाने के लिए 16-17 हजार करोड़ रुपए चाहिए। पोलवरम बांध के जरिये राज्य की सिंचाई व्यवस्था को भी दुरस्त करना है। संसद का छोटा सा सत्र 24 जून से शुरू होगा। स्पीकर का चुनाव 26जून को होना है। उससे पहले नायडू को एक लाख करोड़ रुपए चाहिए। यानी आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू को जब तक मोदी एटीएम से पैसा मिलेगा,तब तक वो मौन समर्थन देंगे। जिस दिन पैसा मिलना बंद हो जाएगा वो समर्थन वापस खींच लेंगे। बिहार सबसे गरीब राज्य है। नीतीश को भी अपने राज्य के लिए विशेष पैकेज चाहिए। जबकि देश पर करीब 3.0 ट्रिलियन डाॅलर का कर्ज है। आमदनी 330 विलयन डाॅलर है। और खर्चा 540 विलियन डाॅलर है। देश में बेरोजगारी 7.6फीसदी है। युवा बेरोजगार 12.4 फीसदी है। देश में 82 फीसदी गरीब जनसंख्या है। ऐसे में कैसे विकसित भारत बनेगा,मोदी भी नहीं जानते।
संसद में कई सवाल उठेंगे -
गठबंधन सरकार के समक्ष केवल आर्थिक चुनौतियां ही नहीं,देश के अंदर पेपर लीक के अलावा संघ की नाराजगी और पार्टी के अंदर विघटन की भी स्थिति है। गडकरी,योगी,डाॅ रमन सिंह,वसुंधरा राजे सिंधिया आदि नेताओं से गुजरात लाॅबी की जमती नहीं। सभी अपने वक्त का इंतजार कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में रेल दुर्घटना,मोदी और अडानी संबंध,एक्जिट पोल के जरिये 11 लाख करोड़ रुपए पहले दिन और फिर 13 करोड़ का खेला जो गुजरात लाॅबी ने किया देश वासियों के साथ,वह भी संसद में उठेगा। पिछले पांच बरस में देश में 43 पेपर लीक कांड हुए हैं। जिसमें केन्द्र सरकार द्वारा आयोजित 16पेपर लीक हुए। यानी 3.50 करोड़ छात्र प्रभावित हुए। नीट यूजी और नेट परीक्षा कांड से मचे बवाल पर 18वी लोकसभा हंगामेदार होगी। क्यों कि इस बार विपक्ष बहुत मजबूत है। वो संसद चलने नहीं देगा। संसद से सड़क तक सरकार को घेरेगा।
विपक्ष का तगड़ा दावा -
राहुल गांधी कभी सुर्खियों वाली राजनीति करते नहीं। वो संसद सत्र शुरू होने से पहले जिस तरह दावा कर रहे हैं,कि बीजेपी के कई सांसद हमारे संपर्क में हैं। ममता बनर्जी,अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे दावा कर रहे हैं कि बीजेपी और एनडीए के कई सांसद उनके संपर्क में है। उससे एक बात साफ है,कि बीजेपी अपना स्पीकर आसानी से बना लेगी,ऐसा नहीं लगता है।
चन्द्रबाबू नायडू की राजनीति से बीजेपी वाले वैसे भी वाकिफ हैं।वैसे मोदी और अमितशाह किसी के सगे नहीं हैं तो दूसरी ओर चन्द्र बाबू नायडू भी किसी के सगे नहीं है। अपने ससुर एनटीरामाराव की सरकार गिरा दिये थे। इतना ही नहीं अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार भी इन्हीं की वजह से गिरी थी। अमितशाह की बिसात से नायडू परिचित हैं। वो कोई सियासी जख्म नहीं चाहते। वो जानते हैं,उनका लोकसभा अध्यक्ष होने पर सरकार उनकी जेब में होगी। सियासी गणित की भाषा में कहें तो मोदी इस दफा संख्या के मामले में कमजोर हैं। दो एन नीतीश और नायडू की बैसाखी के बगैर मोदी नहीं चल सकते।
ये दोनों सियासी,ब्लेक मेल मोदी को करते रहेंगे। गुजरात लाॅबी संशय में है। उसे समझ में नहीं आ रहा है, कि नायडू की शर्त मानें या फिर उनका स्पीकर बन जानें दें। वैसे देखा जाए तो सन् 2004 और 2009 यूपीए सरकार भी गठबंधन की सरकार थी। बाजपेयी की भी सरकर गठबंधन वाली सरकार थी। लेकिन मोदी की सरकार उससे भी कमजोर है। मोदी को सिर्फ 53 अतिरिक्त सांसदों का समर्थन है।
हरियाणा में बीजेपी की बुरी गत -
इसी साल तीन राज्यों में चुनाव है। हरियाणा,महाराष्ट्र और झारखंड।इन राज्यों के चुनाव में मोदी को एनडीए सरकार की गारंटी देनी है। झारंखड में सितम्बर में चुनाव है। हरियाणा में बीजेपी और कांग्रेस दोनों को पांच- पांच सीटें लोकसभा में मिली है। अपने छह सांसदों को बीजेपी ने खो दिया। कांग्रेस 46 सीटों पर और बीजेपी 44 सीटों पर आगे है।बीजेपी के लिए चिंता की बात है क्यों कि उसका वोट शेयर 12 फीसदी घटा है। जबकि कांग्रेस का 20 फीसदी बढ़ा है।रोहतक के सांसद दीपेन्द्र सिंह हुड्डा कहते हैं लोकसभा में बीजेपी को हाफ कर दिया है विधान सभा में साफ कर देंगे।
बहरहाल सियासी तराजू पर मोदी कब तक मेढ़क तौलते हैं,मोदी से नाराज पार्टी के लोग और विपक्ष दोनों की नज़र है।
वी केन न्यूज़ के नेशनल हेड रमेश कुमार' रिपु'द्वारा विशेष