मुंबई | न्यूज़ डेस्क | इनका नाम है पालम कल्याणासुंदरम, तमिलनाडु के एक छोटे से गाँव में रहते थे। लाइब्रेरी साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट हैं और एक गवर्नमेंट कॉलेज में लाइब्रेरियन की नौकरी करते थे। अब यहाँ से आता है दूसरा ट्विस्ट। हर महीने ये अंकल अपनी सारी सैलरी डोनेट कर देते थे—गरीब बच्चों को, भूखे लोगों को, और अनाथ आश्रमों को। और अपना खर्चा चलाने के लिए एक होटल में वेटर का काम करते थे।
1962 में जब इंडो-चाइना वॉर हुई, तो नेहरू ने रिक्वेस्ट की कि अपने देश के लिए कुछ दो। कल्याणासुंदरम के पास कुछ नहीं था, एक गोल्ड की चैन थी, वही दे दी। रियल क्रेजी पार्ट अब स्टार्ट होगा। 35 साल इन्होंने नौकरी की और हर महीने सारी सैलरी डोनेट करी। फिर 1998 में रिटायरमेंट के बाद जो फंड मिला, लगभग 10 लाख रुपये, वो भी डोनेट कर दिया। फिर एक अमेरिकन ऑर्गेनाइजेशन ने इन्हें 'मैन ऑफ द मिलेनियम' का अवॉर्ड दिया, प्राइज में दिए 30 करोड़ रुपये, वो भी डोनेट कर दिए। 2012 में इनके बारे में रजनीकांत को पता चला। पब्लिकली अनाउंस कर दिया कि मैं इन्हें अडॉप्ट कर रहा हूँ एज़ माय फादर। इनको कई बार कहा कि आप आओ मेरे घर, मेरे साथ रहो।
कल्याणासुंदरम ने कहा—नहीं, अभी मेरा काम नहीं खत्म हुआ। 2023 में इन्हें पद्म श्री मिला और अब 84-85 साल की उम्र में ये अपने एनजीओ के थ्रू लोगों की सेवा कर रहे हैं। तो बस अब तो खत्म हो गया ना? नहीं। अब आता है फाइनल ट्विस्ट। क्योंकि इन अंकल ने अपनी आइज और बॉडी भी डोनेट कर दी, इनकी डेथ के बाद तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज को। मतलब ये आदमी जिंदगी भर तो लोगों की सेवा करते ही रहे और अब मरने के बाद भी करेंगे। और फिर हम कहते हैं कि हमारे पास कुछ है नहीं देने को। तो भाई, मैंने आपको कलियुग के 'दानवीर कर्ण' की स्टोरी सुना दी। आप इस पोस्ट को हर किसी को शेयर कर दो ताकि हर किसी को इनके बारे में पता चले।"