लेखक | डॉ. अशोक कुमार वर्मा | “यदि नशा होता अच्छा, तो माँ कहती – खा ले मेरे बच्चा।” यह केवल एक कविता की पंक्ति नहीं, बल्कि नशे के विरुद्ध एक ऐसा संदेश है जो सीधे मन और मस्तिष्क को झकझोर देता है। संसार का कोई भी माता-पिता अपने बच्चे को जानबूझकर ऐसी वस्तु नहीं देना चाहता जो उसके स्वास्थ्य, भविष्य और जीवन को नष्ट कर दे। कुछ समय पूर्व तक माता पिता की यह चिंता होती थी कि मेरी संतान पढ़ लिखकर कुछ बन जाए, लेकिन आज के परिप्रेक्ष में माता पिता की चिंता का स्वरूप परिवर्तित हो चूका है। अब वे ये सोचते हैं कि मेरा बच्चा कुसंग से और नशे से बचा रहे। वास्तव में यही सत्य है। माता पिता अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजने को विवश हैं लेकिन बहुत चिंता करते हैं कि उनका बच्चा नशे से दूर रहे। यही कारण है कि नशे के विषय में विचार करते समय हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि जो वस्तु परिवार, समाज और मानवता के लिए विनाशकारी है, वह कभी भी आनंद, फैशन या आधुनिकता का प्रतीक नहीं हो सकती।
प्रतिवर्ष 26 जून को पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को नशीले पदार्थों के सेवन, तस्करी और उससे उत्पन्न सामाजिक, आर्थिक तथा स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करना है। 7 दिसंबर 1987 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा यह प्रस्ताव पारित किया गया था कि विश्व समुदाय नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध व्यापार के विरुद्ध संगठित प्रयास करेगा। तब से यह दिवस केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मानवता को बचाने का एक वैश्विक अभियान बन चुका है। भारत ने भी इस दिशा में समय रहते महत्वपूर्ण कदम उठाए। वर्ष 1985 में स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट) लागू किया गया। यह कानून नशीले पदार्थों के उत्पादन, भंडारण, परिवहन, बिक्री, खरीद, सेवन और तस्करी को नियंत्रित करता है। समय-समय पर इसमें संशोधन करके इसे और अधिक प्रभावी बनाया गया है। इसके अतिरिक्त वर्ष 1988 में अवैध व्यापार की रोकथाम हेतु अलग से कानून लागू किया गया ताकि नशे के कारोबार में संलिप्त लोगों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जा सके। इन कानूनों का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि समाज को नशे की विनाशकारी प्रवृत्ति से बचाना भी है।
आज नशे की समस्या केवल किसी एक राज्य, वर्ग या आयु समूह तक सीमित नहीं रह गई है। यह एक राष्ट्रीय और वैश्विक चुनौती बन चुकी है। पहले सामान्यतः बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू और शराब को ही नशा माना जाता था, लेकिन अब हेरोइन, स्मैक, चिट्टा, अफीम, गांजा, चरस, सिंथेटिक ड्रग्स, नशीली गोलियां, इंजेक्शन, ई-सिगरेट और ई-हुक्के जैसे अनेक नए रूप सामने आ चुके हैं। इन पदार्थों का प्रभाव इतना घातक होता है कि व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी सोचने-समझने की क्षमता, सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य सब कुछ खो बैठता है। भारत का सीमावर्ती राज्य पंजाब लंबे समय से नशे की समस्या से जूझ रहा है। एक समय देश की समृद्धि का प्रतीक माना जाने वाला यह प्रदेश आज नशे की चुनौती के कारण बार-बार चर्चा में आता है। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से होने वाली तस्करी, ड्रोन के माध्यम से नशीले पदार्थों की आपूर्ति और संगठित अपराधी नेटवर्क ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। यद्यपि यह केवल पंजाब की समस्या नहीं है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश के अनेक राज्यों में नशे से जुड़े अपराध और मृत्यु की घटनाएं निरंतर सामने आ रही हैं। यह स्थिति हमें चेतावनी देती है कि यदि समय रहते प्रभावी उपाय नहीं किए गए तो इसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत घातक हो सकते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि नशे का शिकार सबसे अधिक युवा वर्ग हो रहा है। युवावस्था जीवन का वह स्वर्णिम समय है जब व्यक्ति सपने देखता है, लक्ष्य निर्धारित करता है और अपने भविष्य का निर्माण करता है। लेकिन जब यही युवा नशे की चपेट में आ जाता है तो उसका जीवन दिशाहीन हो जाता है। अनेक युवा प्रारम्भ में केवल उत्सुकता, फैशन, मित्रों के दबाव या मनोरंजन के लिए नशा करते हैं। उन्हें लगता है कि वे कभी भी इसे छोड़ सकते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यही प्रयोग आदत और फिर लत में बदल जाता है। इसके बाद नशा व्यक्ति की आवश्यकता बन जाता है और वह चाहकर भी उससे मुक्त नहीं हो पाता।
प्रश्न उठता है कि युवा नशे की ओर क्यों आकर्षित होते हैं? इसके अनेक कारण हैं। बेरोजगारी, तनाव, अवसाद, पारिवारिक कलह, असफलता, अकेलापन, गलत संगति, सामाजिक दबाव और जागरूकता की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। इसके अतिरिक्त फिल्मों, वेब सीरीज, सोशल मीडिया और कुछ गीतों में नशे को जिस प्रकार ग्लैमर और आधुनिकता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसका भी युवाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जब कोई लोकप्रिय अभिनेता या गायक नशे का प्रदर्शन करता है तो कई युवा उसे सफलता और स्टाइल का प्रतीक मान बैठते हैं। यह प्रवृत्ति अत्यंत भयंकर है। नशा केवल व्यक्ति को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि पूरे परिवार को संकट में डाल देता है। एक नशाग्रस्त व्यक्ति की आय का बड़ा भाग नशीले पदार्थों पर व्यय हो जाता है। परिणामस्वरूप परिवार आर्थिक कठिनाइयों में घिर जाता है। घर में कलह बढ़ती है, बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है और सामाजिक प्रतिष्ठा भी नष्ट हो जाती है। कई बार नशे की लत व्यक्ति को चोरी, हिंसा, लूटपाट और अन्य अपराधों की ओर भी धकेल देती है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि देश में होने वाले 90 प्रतिशत अपराधों की जड़ केवल नशा है। इस प्रकार नशा केवल स्वास्थ्य की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी है। स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो नशे के दुष्परिणाम अत्यंत भयावह हैं। तंबाकू और धूम्रपान से कैंसर, हृदय रोग और फेफड़ों की गंभीर बीमारियां होती हैं। शराब यकृत, मस्तिष्क और हृदय को क्षति पहुंचाती है। ड्रग्स का सेवन मानसिक संतुलन बिगाड़ देता है, स्मरण शक्ति कमजोर कर देता है और व्यक्ति को अवसाद, चिंता तथा आत्महत्या जैसे खतरनाक विचारों की ओर ले जा सकता है। नशीले इंजेक्शनों के उपयोग से एचआईवी, हेपेटाइटिस जैसी घातक व्याधियों का संकट भी बढ़ जाता है।
आज नशे की तस्करी के ढंग भी बदल चुके हैं। आधुनिक तकनीक का दुरुपयोग करते हुए अपराधी ड्रोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से अपने नेटवर्क का विस्तार कर रहे हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन द्वारा नशीले पदार्थ गिराने की घटनाएं चिंता का विषय हैं। इससे स्पष्ट होता है कि नशे के विरुद्ध युद्ध केवल पुलिस या सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का युद्ध है। सौभाग्य से देश में अनेक ऐसे अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और संस्थाएं हैं जो नशा मुक्ति के लिए निरंतर कार्य कर रही हैं। हरियाणा में समय-समय पर चलाए गए अभियान, साइक्लोथॉन यात्राएं, जनजागरण कार्यक्रम, विद्यालयों और महाविद्यालयों में आयोजित प्रतियोगिताएं तथा पुनर्वास केंद्रों की गतिविधियां इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं। हरियाणा राज्य नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो द्वारा जागरूकता को जन आंदोलन का रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। गुरुकुल गमन, नून लौटा, बकेट चैलेंज और हृदय परिवर्तन जैसी पहलें युवाओं को सकारात्मक जीवन मूल्यों से जोड़ने का कार्य कर रही हैं।
नशामुक्ति एवं पुनर्वास की सफलता: यह सत्य है कि नशा व्यक्ति को अंधकार की ओर ले जाता है, लेकिन सही उपचार, परामर्श और सामाजिक सहयोग से नशे की पकड़ से बाहर निकला जा सकता है। देशभर में ऐसे हजारों उदाहरण हैं जहाँ नशे की लत से जूझ रहे युवाओं ने नशा मुक्ति केंद्रों, चिकित्सकीय उपचार, मनोवैज्ञानिक परामर्श और परिवार के सहयोग से नया जीवन प्राप्त किया है। हरियाणा सहित विभिन्न राज्यों में अनेक युवक-युवतियाँ नशे को छोड़कर आज सम्मानपूर्वक जीवन जी रहे हैं, रोजगार प्राप्त कर चुके हैं और समाज में सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं। कुछ लोग स्वयं नशा मुक्ति अभियान से जुड़कर दूसरों को भी इस दलदल से बाहर निकालने का कार्य कर रहे हैं। ये उदाहरण सिद्ध करते हैं कि नशे की लत भले ही गंभीर समस्या हो, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति, परिवार के सहयोग और उचित पुनर्वास व्यवस्था के माध्यम से इससे मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।
परिवार और समाज की भूमिका: नशे के विरुद्ध लड़ाई की शुरुआत परिवार से होती है। माता-पिता बच्चों के प्रथम शिक्षक होते हैं और उनके व्यवहार का बच्चों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि परिवार में स्वस्थ वातावरण, संवाद और संस्कारों का माहौल हो तो बच्चों के भटकने की संभावना काफी कम हो जाती है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों के मित्रों, दिनचर्या और व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों पर ध्यान दें। सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं को भी नशा विरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। जब पूरा समाज मिलकर नशे के विरुद्ध वातावरण तैयार करता है, तब युवाओं को सही दिशा मिलती है।
शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी: विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय नशा मुक्त समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। शैक्षणिक संस्थानों में समय-समय पर नशा विरोधी जागरूकता कार्यक्रम, संगोष्ठियां, निबंध प्रतियोगिताएं, खेलकूद गतिविधियां और परामर्श सत्र आयोजित किए जाने चाहिए। विद्यार्थियों को यह समझाया जाना चाहिए कि नशा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि यह जीवन की अनेक नई समस्याओं को जन्म देता है। यदि युवाओं की ऊर्जा को खेल, शिक्षा, कला, साहित्य और सामाजिक सेवा जैसे सकारात्मक कार्यों में लगाया जाए तो वे नशे जैसी बुराइयों से स्वतः दूर रहेंगे।
अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस हमें यह संदेश देता है कि नशा किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि स्वयं एक बहुत बड़ी समस्या है। क्षणिक आनंद के लिए लिया गया नशा जीवनभर का दुःख बन सकता है। इसलिए हमें अपने परिवार, समाज और राष्ट्र को नशा मुक्त बनाने का संकल्प लेना चाहिए। जब तक समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक केवल कानून और सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। आइए, इस 26 जून को हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि स्वयं नशे से दूर रहेंगे, दूसरों को भी इसके दुष्परिणामों के बारे में जागरूक करेंगे और नशा मुक्त भारत के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाएंगे। तभी हम एक स्वस्थ, सुरक्षित और समृद्ध समाज का निर्माण कर पाएंगे। अंत में फिर वही पंक्तियां जो नशे के विरुद्ध सबसे बड़ा संदेश देती हैं— यदि नशा होता अच्छा, सबसे पहले माँ कहती खा ले मेरे बच्चा। यही सत्य है, यही चेतावनी है और यही नशा मुक्त समाज की सबसे बड़ी सीख है।