ना कहो जागने को
अभी
ना कहो मुझसे जागने को ,
कई
बरसों में पलक झपकी हैं मैंने |
नींद
बहुत दूर है किसी शाख पर ,
बमुश्किल
थोड़ी सी लपकी है मैंने ||
दरिया
से जैसे बह गए आँसुओ के ,
एक
बूँद की प्यास जगा रखी है मैंने |
सुना
है रेत में मिलता है पानी ,
तेरे
मिलने की आस जगा रखी है मैंने ||
भूल
गए तुम भी सनम मुझको ,
तेरे
लिए दुनिया भुला रखी है मैंने |
सेज
पर दफ़न कर गए अरमां मेरे ,
तेरे
लिए कब से सजा रखी है मैंने ||
शमशान
पर नज़र आया साया मेरा ,
ज़िंदगी
बिन उसके बिता रखी है मैंने |
आओ
अब दे दो अग्नि मुझको ,
लाश
अपनी चिता पर बिछा रखी है मैंने ||
" मन
" तो जागता रहा है सदियों से ,
सो
जा अब मौत को नींद बना रखी है मैंने |
अभी
ना कहो मुझसे जागने को ,
कई
बरसों में पलक झपकी है मैंने ||
मनिंदर सिंह
भाटिया " मन "