March 23, 2026

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अभी ना कहो मुझसे जागने को , कई बरसों में पलक झपकी हैं मैंने : 'मन' साहब की शानदार रचना

नींद बहुत दूर है किसी शाख पर , बमुश्किल थोड़ी सी लपकी है मैंने




ना कहो जागने को

 

अभी ना कहो मुझसे जागने को ,

कई बरसों में पलक झपकी हैं मैंने |

नींद बहुत दूर है किसी शाख पर ,

बमुश्किल थोड़ी सी लपकी है मैंने ||

 

दरिया से जैसे बह गए आँसुओ के ,

एक बूँद की प्यास जगा रखी  है मैंने |

सुना है रेत में मिलता है पानी ,

तेरे मिलने की आस जगा रखी है मैंने ||

 

भूल गए तुम भी सनम मुझको ,

तेरे लिए दुनिया भुला रखी है मैंने |

सेज पर दफ़न कर गए अरमां मेरे ,

तेरे लिए कब से सजा रखी है मैंने ||

 

शमशान पर नज़र आया साया मेरा ,

ज़िंदगी बिन उसके बिता रखी है मैंने |

आओ अब दे दो अग्नि मुझको ,

लाश अपनी चिता पर बिछा रखी है मैंने ||

 

" मन " तो जागता रहा है सदियों से ,

सो जा अब मौत को नींद बना रखी है मैंने |

अभी ना कहो मुझसे जागने को ,

कई बरसों में पलक झपकी है मैंने ||

 

मनिंदर सिंह भाटिया " मन "




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