लेखक | डॉ. अशोक कुमार वर्मा | प्रतिवर्ष 8 मार्च को पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल महिलाओं को सम्मान देने का अवसर ही नहीं है, बल्कि उनके संघर्ष, त्याग, उपलब्धियों और समाज में उनके अमूल्य योगदान को याद करने का भी दिन है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का उद्देश्य महिलाओं को समाज के प्रत्येक क्षेत्र में समान अधिकार, अवसर और सम्मान दिलाने के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है। यह दिन हमें यह सोचने के लिए भी प्रेरित करता है कि आज के आधुनिक युग में महिलाओं की स्थिति क्या है और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए हमें क्या प्रयास करने चाहिए। इतिहास पर दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि वर्ष 1908 में अमेरिका की महिलाओं ने समान अधिकारों, सुदृढ़ कार्य परिस्थितियों और उचित मजदूरी की मांग को लेकर आंदोलन किया था। उस समय महिलाएं लंबे समय तक काम करती थीं, परंतु उन्हें पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती थी और उनके अधिकार भी सीमित थे।
महिलाओं ने इस अन्याय के विरुद्ध आंदोलन किया और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया। इसके बाद 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में एक अंतरराष्ट्रीय महिला समाजवादी सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में जर्मनी की समाजसेवी क्लारा जेटकिन ने यह प्रस्ताव रखा कि प्रत्येक वर्ष महिलाओं के अधिकारों और समानता के समर्थन में एक दिन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव को सम्मेलन में उपस्थित सभी प्रतिनिधियों ने समर्थन दिया। इसके बाद कई देशों में महिला दिवस मनाया जाने लगा। वर्ष 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने आधिकारिक रूप से 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की। इसके बाद से यह दिवस पूरे विश्व में बड़े उत्साह और सम्मान के साथ मनाया जाने लगा। इस दिन विभिन्न कार्यक्रम, संगोष्ठियां, रैलियां और जागरूकता अभियान आयोजित किए जाते हैं, जिनका उद्देश्य महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और समाज में समानता को बढ़ावा देना है।
यदि हम भारत की बात करें तो यहां प्राचीन काल से ही नारी को उच्च स्थान दिया गया है। भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति, ममता और त्याग का प्रतीक माना जाता है। हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में भी नारी को विशेष महत्व दिया गया है। भगवान के नाम का उच्चारण करते समय भी नारी को पहले स्थान पर रखा जाता है, जैसे – सीताराम, राधेश्याम, लक्ष्मीनारायण आदि। कभी भी किसी भगवान की मूर्ति को देखते हैं तो उसमें युगल को स्थापित किया जाता है। पुरातन समय में राजा महाराजा भी अपनी रानी के संग बैठे दिखाई देते हैं। इतना ही नहीं, भारत की पवित्र नदियों के नाम भी नारी शक्ति का प्रतीक हैं, जैसे – गंगा, यमुना, सरस्वती, कावेरी और गोदावरी। भारत में अपने देश को भी “भारत माता” कहकर संबोधित किया जाता है। जब किसी घर में पुत्री का जन्म होता है तो लोग कहते हैं कि “घर में लक्ष्मी आई है।” यह सब उदाहरण इस बात को स्पष्ट करते हैं कि भारतीय समाज में नारी को सम्मानित स्थान प्राप्त है। इसके साथ ही यह भी एक सच्चाई है कि आज भी समाज के कई हिस्सों में महिलाओं को अनेक कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। शिक्षा की कमी, सामाजिक कुरीतियां, भेदभाव, घरेलू हिंसा और असमान अवसर जैसी समस्याएं आज भी कई महिलाओं के जीवन को प्रभावित करती हैं। इसलिए महिलाओं की स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए समाज में जागरूकता और शिक्षा का प्रसार अत्यंत आवश्यक है। कहा भी गया है—
सबसे प्रथम कर्तव्य है शिक्षा बढ़ाना देश में,
शिक्षा बिना ही आज हम पड़ रहे हैं क्लेश में।
शिक्षा बिना कभी कोई बन सकता नहीं सत्पात्र है,
शिक्षा बिना कल्याण की आशा दुराशा मात्र है।
एक शिक्षित महिला केवल अपने जीवन को ही नहीं बदलती, बल्कि पूरे परिवार और समाज को भी प्रगति के मार्ग पर ले जाती है। एक शिक्षित और संस्कारित महिला अपने परिवार की धुरी होती है। वह अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देती है, परिवार को एकजुट रखती है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है। आज के आधुनिक युग में महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं। शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, खेल, राजनीति, सेना, प्रशासन और व्यवसाय जैसे अनेक क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी योग्यता और क्षमता का प्रमाण दिया है। भारत में भी कई ऐसी महिलाएं हुई हैं जिन्होंने अपने साहस, परिश्रम और प्रतिभा के बल पर देश का नाम रोशन किया है। 
आज महिलाएं केवल घर की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे देश के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। एक ओर जहां महिलाएं एक सफल चिकित्सक, वैज्ञानिक, शिक्षक और नेता के रूप में समाज का मार्गदर्शन कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वे एक आदर्श माता, पत्नी और बहन के रूप में परिवार की आधारशिला भी बनी हुई हैं। महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल महिलाओं को स्वतंत्रता देना नहीं है, बल्कि उन्हें शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान और समान अवसर प्रदान करना भी है। जब तक समाज में महिलाओं को समान अधिकार और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह संदेश देता है कि हमें महिलाओं के प्रति अपनी सोच को सकारात्मक बनाना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि नारी केवल परिवार की ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र की शक्ति है। यदि हम महिलाओं को उचित अवसर और सम्मान देंगे, तो वे समाज और राष्ट्र के विकास में और भी अधिक योगदान दे सकेंगी। अंततः कहा जा सकता है कि नारी शक्ति ही समाज की वास्तविक शक्ति है। नारी के बिना जीवन, परिवार और समाज की कल्पना अधूरी है। इसलिए हमें केवल एक दिन महिला दिवस मनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वर्ष के प्रत्येक दिन महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए प्रयास करना चाहिए। जब समाज में नारी को समान अधिकार, सम्मान और अवसर प्राप्त होंगे, तभी एक सशक्त, समृद्ध और विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव हो सकेगा। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें यही प्रेरणा और संदेश प्रदान करता है।