यह देश के लिए बहुत बड़े गौरव का विषय है कि भारत का इतिहास महावीरों की गाथाओं से भरा पड़ा है। भारत की धरती पर महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी जैसे वीरों ने देश को विश्व में नया कीर्तिमान प्रदान किया, वहीं दूसरी ओर जब स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा होती है तो उस समय अनेक महान स्वतंत्रता संग्राम के महानायक हमारे समक्ष होते हैं जिन्होंने देश के लिए सर्वस्य न्योछावर कर दिया। आज एक ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम के महानायक का बलिदान दिवस है जिन्होंने कहा था मैं आज़ाद था आज़ाद हूँ और आज़ाद ही रहूंगा और करके दिखाया। उनका जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के भाबरा गाँव (वर्तमान अलीराजपुर जिला) में हुआ था। उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। उनकी माता धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और बालक चंद्रशेखर को बचपन से ही वीरता, धर्मनिष्ठा और देशभक्ति की प्रेरणा देती थीं। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अपने गाँव में प्राप्त की, तत्पश्चात वे बनारस (काशी) चले गए। उन्होंने बनारस में रहते हुए संस्कृत की शिक्षा ग्रहण की।
वर्ष 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया, तब युवा चंद्रशेखर भी उसमें कूद पड़े। वे मात्र 15 वर्ष के थे, परंतु उनके हृदय में स्वतंत्रता की ज्वाला धधक रही थी। आंदोलन के समय अंग्रेजी सरकार द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जब उन्हें न्यायालय में प्रस्तुत किया गया तब न्यायाधीश ने उनका नाम पूछा, तो उस युवक ने निर्भीक स्वर में कहा—“मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और निवास स्थान जेल।” उनके इस साहसिक उत्तर से अंग्रेज अधिकारी क्रोधित हो उठे और उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई। प्रत्येक कोड़े के साथ वे “भारत माता की जय” का उद्घोष करते रहे। तभी से वे ‘चंद्रशेखर आजाद’ कहलाए।
असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद कई युवाओं को निराशा हुई, किंतु चंद्रशेखर आजाद ने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े और शीघ्र ही उसके प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। उनका उद्देश्य था—अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंककर भारत में स्वतंत्र और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना करना। आजाद का व्यक्तित्व अनुशासनप्रिय, साहसी और दूरदर्शी था। वे अपने साथियों को कठोर प्रशिक्षण देते थे और संगठन की गोपनीयता बनाए रखने पर विशेष ध्यान देते थे। वे कहते थे कि क्रांतिकारी का जीवन व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए समर्पित होता है।
क्रांतिकारी आंदोलन के अंतर्गत 1925 में काकोरी ट्रेन डकैती की योजना बनाई गई, जिसका उद्देश्य सरकारी खजाना लूटकर संगठन के कार्यों के लिए धन जुटाना था। इस योजना में कई क्रांतिकारी शामिल थे। यद्यपि कई साथियों को गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई, परंतु आजाद अंग्रेजों की पकड़ से बाहर रहे। उन्होंने संगठन को पुनः संगठित किया और नई ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाया। आजाद ने युवा क्रांतिकारी भगत सिंह तथा उनके साथियों को मार्गदर्शन दिया। उन्होंने भगत सिंह और उसके साथियों का लाहौर षड्यंत्र काण्ड और सांडर्स वध जैसी घटनाओं में अप्रत्यक्ष सहयोग किया। वे सदैव अपने साथियों का मनोबल बढ़ाते और उन्हें देश के लिए समर्पित रहने की प्रेरणा देते थे।
27 फरवरी 1931 का दिन भारतीय इतिहास में अमर हो गया जब उस दिन इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद अपने एक साथी से मिलने गए थे। अंग्रेजों कि पुलिस ने गुप्त सूचना पर पार्क को चारों ओर से घेर लिया। आजाद ने बहादुरी से मुकाबला किया और कई घंटों तक अकेले ही पुलिस से संघर्ष करते रहे। जब उनकी अंतिम गोली शेष रह गई, तो उन्होंने उसे स्वयं पर चला दिया, ताकि वे अंग्रेजों के हाथों जीवित न पकड़े जाएँ। इस प्रकार उन्होंने अपने संकल्प—“आजाद थे, आजाद हैं और आजाद ही रहेंगे”—को सत्य सिद्ध कर दिया। उनके बलिदान के बाद अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर चंद्रशेखर आजाद पार्क कर दिया गया। आज भी वह स्थान उनके अदम्य साहस की गाथा सुनाता है |
चंद्रशेखर आजाद केवल एक क्रांतिकारी योद्धा ही नहीं थे, बल्कि उच्च आदर्शों वाले व्यक्ति थे। वे सादगीप्रिय, अनुशासनशील और आत्मसम्मानी थे। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी व्यक्तिगत स्वार्थ को स्थान नहीं दिया। उनका विश्वास था कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी होनी चाहिए। वे एक ऐसे भारत का स्वप्न देखते थे जहाँ समानता, न्याय और बंधुत्व की स्थापना हो। आज के युवाओं के लिए चंद्रशेखर आजाद का जीवन एक प्रकाशस्तंभ के समान है। उनका साहस सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी आत्मविश्वास नहीं खोना चाहिए। उनका त्याग हमें बताता है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है। उनका बलिदान दिवस केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेने का दिन है। यदि युवा वर्ग आजाद के अनुशासन, निष्ठा और देशभक्ति को अपनाए, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आएगा। भ्रष्टाचार, अन्याय और कर्तव्यहीनता जैसी बुराइयों से लड़ने की प्रेरणा हमें उनके जीवन से मिलती है। आज उनके बलिदान दिवस पर प्रत्येक युवा को यह संकल्प लेना होगा कि जियेंगे देश के लिए, मरेंगे तो देश के लिए। यदि प्रत्येक व्यक्ति देश प्रेम को अपने जीवन का मूलमंत्र बना ले तो देश की सभी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाएंगी।
लेखक- डॉ. अशोक कुमार वर्मा