अर्थी
अपनी अर्थी को काँधे पर उठाये घूम रहा हूँ ,
कोई जो अग्नि दे उस सख्श को ढूंढ रहा हूँ |
कभी लगता है कोई सांस है बाकी ,
जाने और कौन सी आस है बाकी ,
मंज़िल भी है रास्ता भी है लापता है कदम ,
ज़िंदा होने का अब लगता है वहम |
आँसुओ के समंदर पी लिये हम ,
जीना था जितना जी लिए हम ,
कागज़ की कश्ती था जीवन हमारा ,
साहिलों पर भी ना मिला किनारा |
आहें भर यूं हि सिसकते रहे ,
हर चौराहे पर बिकते रहे ,
लम्हा लम्हा पल पल मरते रहे ,
हम मौत को तरसते रहे |
खुद को जलाया हमने ,
फिर भी ना छटा अँधेरा ,
भूल चुकीं है आँखे क्या चीज़ है सवेरा ||
कहाँ रखें हम इस देह बेजान को ,
चल " मन " चल दे शमशान को ||
मनिंदर
सिंह भाटिया " मन "