February 26, 2026

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अपनी अर्थी को काँधे पर उठाये घूम रहा हूँ : मनविंदर सिंह "मन"

खुद को जलाया हमने फिर भी ना छटा अँधेरा , भूल चुकीं है आँखे क्या चीज़ है सवेरा |




अर्थी

 

अपनी अर्थी को काँधे पर उठाये घूम रहा हूँ ,

कोई जो अग्नि दे उस सख्श को ढूंढ रहा हूँ |

 

कभी लगता है कोई सांस है बाकी , जाने और कौन सी आस है बाकी ,

मंज़िल भी है रास्ता भी है लापता है कदम , ज़िंदा होने का अब लगता है वहम |

 

आँसुओ के समंदर पी लिये हम , जीना था जितना जी लिए हम

कागज़ की कश्ती था जीवन हमारा , साहिलों पर भी ना मिला किनारा |

 

आहें भर यूं हि सिसकते रहे , हर चौराहे पर बिकते रहे ,

लम्हा लम्हा पल पल मरते रहे , हम मौत को तरसते रहे |

 

खुद को जलाया हमने , फिर भी ना छटा अँधेरा  ,

भूल चुकीं है आँखे क्या चीज़ है सवेरा ||

 

कहाँ रखें हम इस देह बेजान को ,

चल " मन " चल दे शमशान को ||

 

मनिंदर सिंह भाटिया " मन "




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