"अंतर "
अंतर
पीड़ा उभर लहर,
जस ज्वाला दहके,
कुंठित
कंठ सुखाय , बूंद तृष्णा को तरसे,
ह्रदय
ग्राहय गंभीर,
चिन्तनी काया जर जर,
विचलित
व्यथा पात, तरुबर जस पड़ते झर झर,
विस्म्रत
स्वपन सृजन, पटल पर बरबस ढलके ,
कुंठित
कंठ सुखाय, बूंद तृष्णा को तरसे,
पाषाड
शिला का अंतर मुख, दादुर
जल धारे,
आभाषित
जीवन पथ दर्शन,
गृहीत कर बांह पसारे,
सत्य
शिखर पर मंडित- वैभव, नयनन
झलके ।
कुंठित
कंठ सुखाय, बूंद तृष्णा को तरसे,
हो
आत्मसात वैराग,
विरह की तपिष वेदना ,
चैतन्य
शिराएं, गर्भित सार मय अतः चेतन ,
अर्थ
वेदना भई भावना,
नैनन से जब बरसे,
कुंठित
कंठ सुखाय, बूँद तृष्णा को तरसे,
ध्येय
अनंत करलक्ष, लोकरी खोल कपाट,
कटन
सरिस चुभन सैवारनि मिल परस्पर बांटे,
कुटिल
दानकी दम्भ देख मन ही मन धधके ,
कुंठित
कंठ सुखाय, बूँद तृष्णा को तरसे ||
रचयिता - मनविंदर सिंह "मन "