मध्यप्रदेश में चुनाव से पहले गुजरात माॅडल की चर्चा होते ही बीजेपी में कई लोग मुख्यमंत्री बनने की चाह रखते हैं। कैलाश विजय वर्गीय ने खुलकर कहा कि मुझे सी.एम.बना दो। और भी कई लोग सी.एम. बनना चाहते हैं। कर्नाटक में भी मुख्यमंत्री बदले जाने की आहट है। छत्तीसगढ़ में टी.एस.सिंह देव मुख्यमंत्री बनने कई सियासी दांव अजमाए पर कामयाब नही हुए
नई दिल्ली । रमेश कुमार ‘रिपु’ । इन दिनों कैलाश विजय वर्गीय की बात से शिवराज सिंह चौहान के खेमें में हलचल है। वजह यह है कि उन्होंने कहा कि मुझे सी.एम. बना दो। अभी तक कैलाश विजय वर्गीय पश्चिम बंगाल के प्रभारी हैं। चुनाव के बाद वे पश्चिम बंगाल एक बार भी नहीं गए। अगले साल 13 जनवरी 2023 को बीजेपी को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल जाएगा। जाहिर है कैलाश विजय वर्गीय फिर राष्ट्रीय महासचिव नहीं रहेंगे। वे शिवराज मंत्रिमंडल में मंत्री थे,उनसे इस्तीफा लेकर उन्हें पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव बनाया था। उस वक़्त भी हल्ला था उनके सीएम बनने की.पश्चिम बंगाल में बीजपी सौ सीट भी नहीं पा सकी । कैलाश विजय वर्गीय पश्चिम बंगाल में कोई करिश्मा नहीं दिखा सके और चाहते हैं अगले साल चुनाव से पहले उन्हें मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया जाए।
दरअसल जब से हाई कमान ने गुजरात चुनावी माॅडल को मध्यप्रदेश में लागू करने की बात कही तब से कई लोगों के दिलों मे मुख्यमंत्री बनने की चाह जाग गई है। चुनाव से पहले कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदले जाने की आशंका ज्यादा है।
मध्यप्रदेश में 2018 के चुनाव में शिवराज सिंह चुनावी चेहरा थे,लेकिन सरकार कांग्रेस की बनी। इस बार आंतरिक सर्वे की रिपोर्ट में शिवराज केवल बीस फीसदी ही लोकप्रिय है। वहीं मोदी अस्सी फीसदी। वैसे भी अमित शाह ग्वालियर में कह चुके हैं कि चुनाव में मोदी ही चेहरा होंगे। लोकसभा और विधान सभा चुनाव दोनों में मतदाता की सोच अलग अलग होती है। लोकसभा में पिछली दफा 29 में 28 सीट बीजेपी को मिली थी। लेकिन विधान सभा चुनाव में बहुमत जनता ने बीजेपी को नहीं दिया था।
सवाल यह है कि मध्यप्रदेश में क्या चुनाव के लिए शिवराज चेहरा नहीं होंगे। यदि प्रदेश को नया मुख्यमंत्री मिला भी तो कौन होगा? प्रदेश अध्यक्ष वी.डी शर्मा कितने लोकप्रिय हैं इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि पिछली दफा बीजेपी के 16 जिलों में मेयर थे। लेकिन इस बार सात जिलों में नहीं है। जाहिर है कि वी.डी.शर्मा की लोकप्रियता खजुराहो से बाहर नहीं है या कहें बुंदेलखंड से आगे नहीं है। कुछ माह पहले अपने समर्थकों के जरिए खूब हल्ला मचवाए थे कि वे सी.एम. बनने जा रहे हैं। लेकिन ब्राम्हण राजनीति का सूरज ओबीसी की राजनीति के बादल में छिप गया।
नरोत्तम मिश्रा का अहम रोल था कांग्रेस की सरकार गिराने में। प्रदेश के गृहमंत्री हैं। बीजेपी की भगवा राजनीति का बड़ा ख्याल रखते है। लेकिन उनकी राजनीति ग्वालियर-चंबल संभाग तक ही सिमट कर रह गई है। वो कांग्रसियों और फिल्म अभिनेत्रियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए ज्यादा जाने जाते हैं। मीडिया के सामने प्रदेश में अपराध का आंकड़ा उन्हें याद नहीं रहता है। अपराध बढ़ा या फिर घटा। बीजेपी के किस नेता को पीछे करना है,इस गुटबाजी में ज्यादा उनका ध्यान जाता है। लोकप्रियता का मेयार गृहमंत्री होकर जिस तरह छूना चाहिए,जैसा कि अमित शाह का है,उस हद तक प्रदेश में अभी तक नहीं बना पाए हैं। वैसे नरोत्तम मिश्रा भी अब मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं,लेकिन उन्होंने खुलकर नहीं कहा। अब बीजेपी हाईकमान को भी लगता है कि प्रदेश में बीजेपी सरकार बनानी है तो मुख्यमंत्री का चेहरा बदलना पड़ेगा। इसलिए भी कि कमलनाथ सरकार गिराने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया तो मिल गए,लेकिन सरकार बनाने के लिए कुछ और चाहिए।
विघ्य क्षेत्र में ज्योतिरादित्य गुट के चलते राजेन्द्र शुक्ला मंत्री नहीं बनाए गए। चुनाव से पहले मंत्री बदले जाएंगे। यदि वी.डी शर्मा सी.एम बने तो राजेन्द्र शुक्ला इस बार फिर पिछड़ सकते हैं। यही स्थिति नरोत्तम मिश्रा के सी.एम बनने पर होगा। कैलाश विजय वर्गीय के मुख्यमंत्री बनने पर शिवराज सिंह राजेन्द्र शुक्ला का अपनी तरफ से नाम प्रस्तावित कर सकते हैं। वहीं बीजेपी का एक खेमा का मानना है कि शिवराज सिंह यदि राजेन्द्र शुक्ला को मंत्री नहीं बना सके तो प्रदेश अध्यक्ष बनाने की वकालत कर सकते हैं। राजेन्द्र को लेकर वी.डी शर्मा,नरोत्तम मिश्रा,कैलाश विजय वर्गीय और बीजेपी हाईकमान कितना सपोट करता यह बात स्वयं राजेन्द्र शुक्ला भी नहीं जानते। वैसे मंत्री नहीं बनाए जाने के बाद से वे केन्द्रीय मंत्रियों से दिल्ली में अपनी मुलाकात का दायरा बढ़ाए हैं। जे.पी नड्डा से व्यक्तिगत शिवराज सिंह ने राजेन्द्र को मिलवाया था। यदि राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बदला तो राजेन्द्र शुक्ला को चुनाव में बड़ी जवाबदारी मिल सकती है।
बहरहाल बीजेपी में सी.एम बदले जाने की हवा तेज है। वहीं छत्तीसगढ़ में टी.एस सिंह देव को दस जनपथ भूपेश की जगह उन्हें मुख्यमंत्री अब बनाने से रहा। राजस्थान की तरह छत्तीसगढ़ की स्थिति है। सचिन और टी.एस सिंह देव दोनों कांग्रेस में अब कमजोर सैनिक हो गए हैं। राजस्थान में सीएम बदले जाने पर ही छत्तीसगढ़ में कुछ हो सकता है.
जब से गुजरात माॅडल के तहत प्रदेश में चुनाव की बात शुरू हुई है,एक खेमा उत्साहित होकर कह रहा है,अबकि दो सौ के पार। सवाल यह है कि दो सौ के पार पहुंचेंगे कैसे? प्रदेश की जनता में कमलनाथ सरकार को गिरा कर बीजेपी की सरकार जिस तरीके से बनी है,उसे लेकर जनता दो खेमें बंटी हुई है। ज्यादातर का मानना है कि बीजेपी को पांच साल कांग्रेस सरकार के काम काज का इंतजार करना था। कांग्रेस का काम काज ठीक नहीं होने पर जनता वैसे ही हटा देती। लेकिन ऐसा लगता है,बीजेपी को सत्ता से बाहर नहीं रह सकती। अब शिवराज की सरकार को लेकर जनता में पहले की तरह बहुत उत्साह नहीं देखने को मिल रहा है।
बहरहाल सियासत और सत्ता की एक नई कहानी लिखने अन्य दलों से अधिक बीजेपी में मुख्यमंत्री की दावेदारी पर मंथन चल रहा है।