"कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पी.एफ.आई.का देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के साक्ष्य के बावजूद विपक्ष उनकी तबाही की क्षमता को समझने की बजाय अपनी चुनावी संभावनाएं देख रहा है। टेरर फंडिग वालों पर बैन लगने पर अब संघ पर भी प्रतिबंध की बात विपक्ष कर रहा है। जबकि पीएफआई के मंसूबे बुरे हैं।"
नई दिल्ली। रमेश कुमार ‘रिपु’ । रिश्ता पुराना है राजनीति और अपराध का। इस्लामिक संगठन पी.एफ.आई बीस राज्यों में पैर अकेले अपने दम पर नहीं फैलाए। सत्ता का साथ पाकर नापाक मंसूबे की खिचड़ी पकाई। कर्नाटक में सीतारमैया के समय पी.एफ.आई.पर जितने भी मामले थे, सब वापस ले लिये गये थे।
केरल में विधान सभा चुनाव के समय कांग्रेस ने पी.एफ.आई. से समर्थन मांगा था। तब विपक्ष को पी.एफ.आई. बुरी नहीं लगी। एन.आई.ए. और ई.डी. ने तड़ातड़ देश के पन्द्रह राज्यों में पी.एफ.आई के खिलाफ कार्रवाई की तो विपक्ष की भौ तन गई, इस्लामिक संगठन पी.एफ.आई की देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्ता का सारा बही खाता अब सामने है । पी.एफ.आई यानी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया केरल से संचालित होने वाला एक कट्टर इस्लामिक संगठन है। जिसे आर.एस.एस पसंद नहीं है। पिछले दिनों 22 सितम्बर को एन.आइ.ए की रेड के दौरान पी.एफ.आई के सदस्य मोहम्मद बशीर के पास से संघ के पांँच नेताओं को जान से मारने और आर.एस.एस दफ्तर को निशाना बनाने का साक्ष्य मिला। देश की एकता, अखंडता और उसकी संस्कृति को तार-तार करने वाले इस्लामिक संगठन पी.एफ.आई की विपक्ष का वकालत करना,हैरान करता है।
संघ की हिन्दूत्व विचारधारा का विरोध हो सकता है। मगर देश की शिराओं में दहशत का बारूद भरने वाले के पक्ष में राजनीति को जायज नहीं ठहराया जा सकता। हैरानी होती है,पन्द्रह साल में देश के बीस राज्यों में नफरत की पाठशाला खोलने वाले संगठन की बसपा सुप्रीमों मायावती वकालत करती है। पी.एफ.आई.को बैन करके सरकार चुनाव से पहले पी.एफ.आई को टारगेट किया है। अगर पी.एफ.आई देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए खतरा है,तो उस जैसी अन्य संगठनों पर भी बैन लगना चाहिए। आरएसएस भी देश में साम्प्रदायिकता फैला रहा है।’’ समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहान बर्क दवा करते हैं पीएफआई पढ़े लिखों का संगठन है।
सवाल यह है, कि पढ़े लिखे लोगों का संगठन है तो फिर पी.एफ.आई अपने आप को राष्ट्रवादी संगठन क्यों नहीं कहता? जबकि आर.एस.एस अपने आप को राष्ट्रवादी संगठन कहता है। केरल में पीएफआई सदस्य शफीक पायत ने एन.आई से कहा,वह युवकों को बम बनाने की ट्रेनिंग देता है। पटना के पास फुलवारी शरीफ में पी.एफ आई के सदस्यों के पास से मिले दस्तावेज के मुताबिक 2047 तक भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की योजना थी। देश में शरिया कानून लागू कराना। मुस्लिम युवको को जोड़ना। सौ से अधिक संगठन बनाना। देश के राज्यों में पीएफआई का सदस्य मंत्री बने। सांसद बने। राज्यों में यह प्रचारित करना कि आर.एस.एस मुसलमानों के खिलाफ है। संघ भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता हैं।
छापे मारे गये पन्द्रह राज्यों को पी.एफ.आई इस्लामिक स्टेट बनाना चाहता था। देश में क्रूरता की नर्सरी चालने वाली पीएफआई ने दिल्ली के शाहीन बाग में में सी.ए.ए. के विरोध में प्रदर्शन किया। दिल्ली में साम्प्रदायिक दंगे कराए। पैगम्बर पर टिप्पणी विवाद को तूल दिया। सिर तन से जुदा अथवा रैली में हिन्दुओं के खात्मे का नारा इन्होंने बुलंद किया। देश की एकता और अखंडता के खिलाफ साजिश की और संघ को बदनाम किया। देश की अन्य सात आतंकी संगठनों से इनकी सांठगांठ है। हाथरस में जातीय हिंसा की योजना बनाने के प्रमाण मिले।
कर्नाटक में हिजाब विवाद को भड़काया। लव जिहाद के जरिये दूसरे धर्म की लड़कियों को टारगेट किया। केरल में ईसाई लड़कियांँ इनके निशाने में हैं। पी.एम. की रैली में विस्फोट करके जान माल को हाॅनि पहुँचाने के साथ ही बड़ी सियासी हस्तियों को नुकसान पहुंचाने के साक्ष्य मिले। जहांगीरपुरी और कानपुर में हिंसा, राजस्थान के करौली, मध्य प्रदेश के खरगौन में हिंसात्मक घटनाएं। कर्नाटक में भाजपा नेता की हत्या,इतना ही नही इसके ऊपर भारत विरोधी एजेंडा चलाने का भी आरोप है। जिसके सबूत भी जांच एजेंसियों को मिले हैं। केरल के कन्नूर के मट्टनूर में संघ के ऑफिस पर पेट्रोल बम फेंके।
कोल्लम में पी.एफ.आई कार्यकर्ताओं ने दो पुलिसकर्मियों पर हमला भी किया। बावजूद इसके मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना साजिद रशीदी ने एन.आई.ए. की रेड को साजिश करार दिया है। पी.एफ.आई सिमी का दूसरा भाई है। एनआई ने दूसरे राज्यो में भी कार्रवाई कि मगर पीएफआई ने केरल में बंद का आव्हान किया। केरल हाई कोर्ट को कहना पड़ा, हिंसा भड़काने और शांति भंग करने वालों के खिलाफ पुलिस सख्त कार्रवाई करें। टेरर फंडिग करने वाले संगठन पर पांच साल का बैन लगने पर अब संघ पर भी प्रतिबंध की बात विपक्ष कर रहा है। जबकि पी.एफ.आई के बुरे मंसूबे हैं।
जैसा कि पी.एफ.आई के राष्ट्रीय महासचिव अनीस अहमद का आरोप है, केरल में दो सौ चालीस से अधिक लोगों की कत्ल के मामले में आर.एस.एस. का नाम आया है। पी.एफ.आई.पर बैन लगाया जा रहा है तो संघ पर क्यों नहीं? पी.एफ.आई. के किसी भी कार्यकर्ता को आज तक दोषी नहीं ठहराया गया है। लेकिन देश के अंदर कोई भी आतंकी गतिविधियांँ होती है, तो पी.एफ.आई.का नाम लिया जाता है।’’ऐसा नहीं है कि संघ पर प्रतिबंध नहीं लगा है। पहली बार 4 फरवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या पर 18 महीने तक बैन था। दूसरी बार 1975 में इमरजेंसी के दौरान दो साल बाद बैन हटाया गया। तीसरी बार 1992 में बाबरी मस्जिद के विंध्वंस के बाद छह महीने बाद पाबंदी हटाई गई।
देश में वामपंथी तबका जो संघ और बीजेपी से अलग सोच रखता है,पी.एफ.आई के खिलाफ कार्रवाई को शक की निगाहों से देख रहा है। उसे लगता है इस कार्रवाई के पीछे बीजेपी और संघ के अपने सियासी फायदे हैं। कर्नाटक में आर.एस.एस का जो प्रयोग है,उस पर पी.एफ.आई चोट करता आया है। केरल में आर.एस.एस है पर बीजेपी नहीं है। उसकी स्थिति बड़ी दयनीय है। संगठन का विकास शून्य है। 2016 में बीजेपी 98 सीटों पर चुनाव लड़ी। सात सीटों पर दूसरे नम्बर पर थी। साल 2021 में 115 सीटों पर चुनाव लड़ी। एक भी सीट नहीं जीती।
सबरीमाला मुद्दे पर सहानुभुति का वोट कांग्रेस ले गई। इसलिए कि बीजेपी यह भरोसा नहीं दिला सकी कि वो सी.पी.एम. के खिलाफ चुनाव लड़ सकती है। केरल की राजनीत हिन्दू,मुस्लिम और ईसाई तीन ध्रुवों मे बंटी है। यहांँ पीएफआई, सी.पी.एम और आर.एस.एस से टक्कर लेता आया है। बीजेपी से नहीं। पीएफआई के फंडिग का सबसे बडा केन्द्र केरल है। क्यों कि इसका आतंक केरल में ज्यादा है। पीएफआई के बैन से केरल ही नहीं अन्य राज्यों मे भी डर और आतंक के माहौल में कमी आयेगी।