July 09, 2022

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महाराष्ट्र की रंग बदलती राजनीति : बीजेपी की गुगली से उद्धव बोल्ड




रायपुर । रमेश कुमार "रिपू " । "बाला साहेब ठाकरे के समय हिन्दुत्व का चेहरा शिवसेना की पहचान थी। छप्पन साल की उस शिवसेना की तस्वीर बीजेपी ने एक झटके में बदल दी। पूरी ताकत के साथ बीजेपी शिंदे के पीछे खड़ी है,ताकि महाराष्ट्र में हर जगह भगवा झंडा लहरा सके और शिवसेना खत्म हो जाये। ऐसे में मातुश्री की पहचान क्या होगी,स्वयं उद्धव ठाकरे भी नहीं जानते।" ‘एक थे उद्धव और एक थी शिवसेना’।

महाराष्ट्र के सियासी पर्दे पर इन दिनों यही फिल्म चल रही है। इस फिल्म के बनने की शुरूआत तभी हो गई थी जब उद्वव ठाकरे ने बीजेपी और शिवसेना के पिछले तैंतीस सालांे के सियासी रिश्ते के चराग को मातुश्री में अमित शाह के सामने हमेशा-हमेशा के लिए बुझा दिया। दरअसल अमित शाह नौ नवम्बर 2019 को मातुश्री गये थे उद्धव ठाकरे से मिलने नई सरकार के गठन के मसौदे पर बात करने। लेकिन उद्धव ने सत्ता के मोह में कांग्रेस और एनसीपी से गठबंधन कर मुख्यमंत्री बन गये।

उन्हें लगा वे जो चाहते थे, बगैर बीजेपी के भी पा गये। उद्वव ठाकरे मुख्यमंत्री बन गये लेकिन शिवसेना की हिन्दू वादी छवि पर लगातार कालिख मलते गये। बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना महाराष्ट्र विकास अगाड़ी पार्टी बन गई। शिवसेना के शाखा प्रमुख रहे एकनाथ शिंदे के मन को रह-रह कर बाला साहेब ठाकरे की बात पिंच करती थी। बात सन् 2012 की विजयदशमी की है। उस समय बाल साहब ठाकरे का स्वास्थ्य ठीक नहीं था,इसलिए वे शिवाजी पार्क नहीं गये। और मातुश्री से वीडियो कांन्फ्रेस के जरिये शिवसेना को संबोधित किया। उन्होंने कहा,‘‘ मैं उद्धव और आदित्य ठाकरे को कभी आप पर थोपूंगा नहीं। यदि कभी लगे कि मैं थोप रहा हूँ,तो शिवसेना छोड़ देना।

बाला साहेब की कही बात का शिवसेना के 16 विधायक सहित शिंदे ने अनुशरण किया। शिवसेना के विधायक टूट कर शिंदे के सियासी छाते तले आ गये। और महाराष्ट्र विकास अगाड़ी पार्टी की सरकार का क्लामेक्स खत्म हो गया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि शिवसेना क्या बिना ठाकरे परिवार के चल सकती है या रहेगी? क्या उद्वव महाराष्ट्र की राजनीति में अल्पविराम हो जायेंगे? मातुश्री की पहचान क्या होगी? क्यों कि विधान सभा में बीजेपी ने अपना अध्यक्ष राहुल नार्वेकर को बनाकर उद्वव ठाकरे को शह देकर मात दे दी। क्या यह मान लिया जाये कि महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे का सियासी चेप्टर खत्म करने के मकसद से सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी बीजेपी ने देवेन्द्र फड़णवीस के बजाय एकनाथ शिंद को मुख्यमंत्री बनाया। शिंदे को मुख्यमंत्री बनाना यानी महाराष्ट्र सरकार दिल्ली के रिमोट पर चलेगी। जिसके हाथ में सत्ता होती है,उसी के पास पुलिस,फिल्म जगत,निवेशक,मजदूर यूनियन,विभिन्न कामगार, मुंबई और पश्चिमी मुंबई, जो कि आर्थिक नगरी है,आदि पर नियंत्रण होता है।

देश की जीडीपी में महाराष्ट्र का योगदान 14.2 फीसदी है। महाराष्ट्र में बीजेपी अपनी सियासी जमीन का विस्तार अभी तक शिवसेना के साथ मिलकर करती आई है। और शिवसेना अपनी सियासी जमीन खोती गई। मातुश्री से चलने वाली सरकार के हाथ में अब न उसके शिवसेना के विधायक हैं और न ही सत्ता है।मराठा मानुष की बात करने वाले शरद पवार की सियासी ताकत भी छिन गई। उनके सामने दिक्कत है अपनी बेटी सुप्रिया सुले को कैसे खड़ा करेंगे। उद्धव ठाकरे के सामने विकट समस्या है। शिवसेना के विधायकों में फूट के बाद सांसद और पदाधिकारी शिंदे के साथ चले गये तो शिवसेना को भारी नुकसान होगा। फिर महाराष्ट्र में बीजेपी इकलौती हिन्दुत्व पार्टी हो जायेगी। देर सबेर यही होना है। इसलिए कि एनसीपी के दो विधायक अनिल देशमुख और नवाब मलिक ई.डी. के चलते जेल में हैं। शिवसेना के संजय राउत से पूछताछ चल ही रही है।

ई.डी. का चक्र उद्वव ठाकरे तक भी जा सकता है। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने महाराष्ट्र के विधान सभा चुनाव में कहा था,शिवसेना वसूली पार्टी है। शिवसेना का आर्थिक स्त्रोत बीएमसी है। बीएमसी में बीजेपी कब्जा करना चाहेगी। इसलिए कि बीएमसी का अकेले का बजट 46 हजार करोड़ रुपये है। जो किसी भी छोटे राज्य के बजट से कहीं अधिक है। एकनाथ शिदें के जरिये बीजेपी उद्वव ठाकरे की शिवसेना को खत्म करने की शुरूआत कर दी है। विधान सभा में शिंदे को बहुमत मिलना और बीजेपी के राहुल नार्वेकर का विधान सभा अध्यक्ष बनना। नार्वेकर ने विधानसभा में शिवसेना विधायक दल के नेता और चीफ व्हिप पद पर अजय चैधरी और सुनील प्रभु की नियुक्ति रद्द कर दी है। यानी सदन में अब शिवसेना विधायक दल के नेता मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और चीफ व्हिप भरत गोगावले होंगे।

शिवसेना ने नई अर्जी दायर करके सुप्रीम कोर्ट से मांग की है, 16 बागी विधायकों को वोट देने से रोका जाए। हालांकि इस पर 11 जुलाई को सुनवाई होगी। कोर्ट का फैसला बागी विधायकों के खिलाफ आने पर सरकार का पासा पलट सकता है। उद्धव मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवसेना की हिन्दूवादी छवि को दरकिनार कर कांग्रेस की भाषा बोलने लगे। कांग्रेस की पसंद की राजनीति करने लगे। शिवसेना के विधायकों और पदाधिकारियों को रास नहीं आ रहा था। सत्ता के मद में उद्धव शिवसेना के लिए कालिदास बन गये थे। उद्धव ठाकरे के सामने सबसे बड़ी समस्या है किसी तरह बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना को बचाना। जिस शिवसेना के दम पर उद्धव महाराष्ट्र में अपनी राजनीति करते थे और बीजेपी के बड़े लीडर को अपने मातुश्री में आने के लिए विवश करते आए हैं,वह ताकत अमितशाह ने शिवसेना में फूट डालकर उनसे छीन ली। यह कहना गलत न होगा कि,शिवसेना में अब बालसाहब ठाकरे युग का अवसान हो चुका है। इस युग की समाप्ति की घोषणा भले ही औपचारिक रूप न की गई हो लेकिन एकनाथ शिंदे ही नहीं शिवसेना का हर विधायक,हर कार्यकत्र्ता मानता है, कि उद्धव ठाकरे की वजह से बाला साहेब ठाकरे वाली शिवसेना का चेहरा बदल गया है। और वह शिवसेना कांग्रेस हो गई है। उसकी भाषा भी बदल जाने की वजह से शिवसेना के विधायकों की पहचान पर सवालिया निशान लगने लगा। क्यों कि काग्रेस की इमेज सेक्यूलर की है। मातुश्री के बाहर शिवसेना के लोग क्या बातें कर रहे हैं,अपने काकस में घिरे उद्वव कभी ध्यान नहीं दिया। उद्धव ठाकरे सी.एम. बनने के बाद शिवसेना के विधायकों,सांसदों को तवज्जो देना बंद कर दिये थे। राज्य सभा और विधान परिषद के चुनाव के परिणाम से उद्धव नहीं समझ पाये कि उनके और शिवसेना विधायकों के बीच दूरियां बढ गई है। उनकी सरकार पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं। राज्य सभा के चुनाव में बीजेपी के तीन सदस्य जीत गये। जबकि बीजेपी के पास निर्दलियों को मिलाकर 113 विधायक होते हैं। फिर भी उसे 123 वोट मिले। और विधान परिषद के चुनाव में 132 वोट मिले। जाहिर सी बात है कि बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव में सत्तापक्ष के 10 विधायकों को तोड़ा था। वही एमएलसी चुनाव में बीजेपी को 134 वोट मिले। यानी बीजेपी के साथ अब तक सत्तापक्ष के 21 विधायक आ गए थे।सवाल यह है कि क्या अब महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे शिवसेना के ब्रांड एम्बेसेडर नहीं रह गये? इतिहास के पन्ने बताते हैं कि सन् 2005 में नारायण राने को बाल ठाकरे शिवसेना में लाना चाहते थे। जब इसकी खबर उद्वव को लगी तो उन्होंने कहा,यदि नारायण राने को शिवसेना में लायेंगे तो मै और मेरी पत्नी रश्मी मातुश्री छोड़कर चले जायेंगे। बाल साहब ठाकरे अपने बेटे की जिद के आगे झुक गये। तब नारायण राने ने कहा था, उद्धव बहुत अच्छे आदमी हैं,लेकिन नेतृत्व के रूप में अच्छे नहीं है। उनके नेतृत्व में शिवसेना का कोई भविष्य नहीं है। यानी राने ने उद्धव के बारे में जो बात कही थी,वो सही कही थी। उद्धव के प्रति शिवसेना के जिन लोगों का जुड़ाव था,वो भी खत्म हो गया। एक थी उद्धव की शिवसेना,अब कहना पड़ रहा है। #रमेश कुमार "रिपु "





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