मुंबई | हस्तरेखा तज्ञ विनोद जी | नवरात्रि के नौ दिनों में भक्त देवी मां की उपासना करते हैं| मां दुर्गा की आराधना में कोई कोरकसर बाकी न रह जाए, इसकी लोग पूरी कोशिश करते हैं| कहते हैं कि अगर सही विधि विधान से कोई भी पूजा की जाए तो ही वह सफल होती है, वर्ना जिस उद्देश्य को लेकर पूजा की जाती है वह उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता है|
नवरात्रि के दौरान माता का हर भक्त श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ जरूर करने की लालसा रखता है| बहुत से लोग इस पाठ को करते भी हैं लेकिन जानकारी की कमी के चलते पूजन की सही विधियों का ध्यान नहीं रख पाते हैं और पूर्ण फल से वंचित रह जाते हैं| श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ की धर्मग्रंथों में कई विधियां कही गई हैं|
इस विधि से करें श्री दुर्गा सप्तशती पाठ
श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ प्रारंभ करने से पहले प्रथम आराध्य श्रीगणेश जी, शिवजी, विष्णुजी, माता जगदंबा आदि देवी-देवताओं का स्मरण कर उनकी पूजा कर लेनी चाहिए. इसके बाद पुस्तक का पूजन करें|
इसकेलिए पुस्तक पर जल छिड़ककर स्नान भाव से स्नान कराएं. इसके बाद धूप-दीप, पुष्प आदि पवित्र पुस्तक पर समर्पित करें| जब भी श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करें तो उस वक्त पुस्तक को मां भगवती का स्वरुप ही मानना चाहिए|
इस पुस्तक का पाठ शुरु करने से पूर्व “नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नम: प्रकृत्यै भद्रायैनियता:प्रणता:स्मताम्॥” मंत्र से पंचोपचार पूजन करना चाहिए| ग्रंथ पूजन के बाद श्री देवी कवच, श्री अर्गला स्त्रोतम्, श्री कीलक स्त्रोत का पाठ भी अवश्य कर लेना चाहिए| इसके बाद नवार्ण मंत्र “ऊं ऐं ह्री क्लीं चामुण्डायै विच्चै” की कम से कम एक माला जपनी चाहिए|
इसके बाद रात्रिसूक्त पाठ करने का भी विधान बताया गया है| इस विधि का पालन कर अगर श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है तो भक्तों को इसका संपूर्ण फल प्राप्त होता है|
ये जरूरी नहीं है कि श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ एक दिन में ही कर लिया जाए| सप्तशती में 700 श्लोक हैं, ये सभी 13 अध्यायों में समाहित हैं. इनका पाठ आठ दिन में भी संपन्न किया जा सकता है|