नागपुर । प्रा विवेक बांबल। एक समय था जब शादी का - निमंत्रण केवल सूचना नहीं, बल्कि रिश्तों की आत्मा हुआ करता था । मोटे कागज पर छपे, सुगंधित और सजे-धजे विवाह पत्र हाथ में आते ही घर में उत्साह की लहर दौड़ जाती थी। हर पंक्ति में अपनापन, हर एक शब्द में सम्मान और हर निमंत्रण में भावनाओं की गर्माहट होती थी।
लेकिन वक्त के साथ तस्वीर बदल गई है । आज वही शादी का निमंत्रण मोबाइल स्क्रीन पर एक "फॉरवर्ड मैसेज" बनकर सिमट गया है, और इसी के साथ रिश्तों की वह गहराई भी कहीं खोती नजर आ रही है । डिजिटल युग ने जीवन को तेज और सुविधाजनक जरूर बनाया है, लेकिन इस तेजी में भावनाओं की ठहराव भरी अनुभूति कहीं पीछे छूट गई है । व्हाट्सऐप, ई-मेल और सोशल मीडिया पर भेजे जाने वाले शादी के निमंत्रण अब औपचारिकता बनकर रह गए हैं । दो तस्वीरें, एक लिंक और नीचे लिखा, आप सपरिवार आमंत्रित हैं । बस यहीं कहानी खत्म हो जाती है । पहले शादी का कार्ड भेजना अपने आप में एक रस्म होती थी ।
घर-घर जाकर निमंत्रण देना, बड़े-बुजुर्गों के चरण छूकर आशीर्वाद लेना, चाय-पानी के साथ बातचीत करना इन सबमें रिश्तों की डोर और मजबूत होती थी । आज वही काम कुछ सेकेंड में पूरा हो जाता है, लेकिन दिलों के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है । सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल निमंत्रण ने समय और खर्च जरूर बचाया है, पर इसके बदले रिश्तों की आत्मीयता की कीमत चुकानी पड़ रही है । शादी जैसे पवित्र और व्यक्तिगत संपर्क का अभाव लोगों को भावनात्मक रूप से दूर कर रहा है । कई बार निमंत्रण फॉरवर्ड में गुम हो जाता है, तो कई बार लोग इसे गंभीरता से ही नहीं लेते।