नागपुर । प्रा. विवेक बांबल । सामाजिक और नैतिक उत्थान का मुल मंत्र यह था कि, यदि व्यक्ति सत्य के प्रति निष्ठावान हो जाए तो समाज अपने आप ऊँचे स्तर तक पहुँच सकता है, क्योंकि सत्य और संयम व्यक्ति को आत्मबल, स्वाभिमान और आत्मसम्मान प्रदान करते हैं, वहीं असत्य मनुष्य को भीतर से कमजोर और अपराधबोध से ग्रस्त करता है ।
संत कबीरदास जैसे संतों ने भी सत्य को ईश्वर के समान माना और समाज को झूठ से दूर रहने की सीख दी, क्योंकि झूठ केवल व्यक्ति को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को विकृत करता है और यही कारण है कि असत्य को सभी बुराइयों की जड़ माना गया है, आज भौतिक सुखों की अंधी दौड़ में पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते केवल औपचारिक बनकर रह गए हैं और मनुष्य अपनी सुविधा और सफलता के लिए बिना संकोच झूठ का सहारा ले रहा है, जिससे सामाजिक व्यवहार में असंवेदनशीलता और अविश्वास बढ़ता जा रहा है।
नैतिकता और अनैतिकता के बीच की महीन रेखा को पहचानने की क्षमता कमजोर पड़ती जा रही है और मनुष्य किसी भी साधन को सही ठहराने में लगा है यदि उससे उसे लाभ मिलता है तो परिणामस्वरूप समाज में असंतुलन, विघटन और संबंधों का क्षय साफ दिखाई देता है।
जब-जब समाज ने सत्य और नैतिकता से दूरी बनाई है तब-तब पतन की प्रक्रिया तेज हुई है, आज जब भौतिक संपन्नता को ही सफलता का मापदंड बना लिया गया है तब मानवीय संबंध, संवेदनाएं और सामाजिक जिम्मेदारियाँ पीछे छूटती जा रही हैं और नैतिक मूल्यों की परंपरा लगभग समाप्ती की ओर है, ऐसे समय में यदि सत्य, संयम और ईमानदारी को जीवन का आधार नहीं बनाया गया तो भारतीय समाज भी धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ जाएगा जहाँ रिश्ते, संवेदना और मानवीय गरिमा केवल शब्दों तक सीमित रह जाते हैं, और तब हम केवल पछतावे के सिवा कुछ नहीं कर पाएंगे ।
आज नैतिकता दूसरों को उपदेश देने की वस्तु बन चुकी है जबकि स्वयं के आचरण में उसका अभाव दिखाई देता है, मनुष्य जो स्वयं सामाजिक व्यवस्था का निर्माता है वही अब लोभ, आलस्य और संग्रह की प्रवृत्ती मेफँसकर कम मेहनत में अधिक लाभ पाने के लिए झूठ धोखे को सामान्य मानने लगा है, जो भारतीय सामाजिक के लिए शुभ संकेत नहीं है और यदि समय रहते सत्य आधारित जीवन दृष्टि को नहीं अपनाया गया तो सामाजिक और मानवीय मूल्यों का क्षरण और तेज होता चला जाएगा।