नागपुर । प्रा.विवेक बांबल । दिव्यांग होना किसी व्यक्ति की कमजोरी नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी अदम्य इच्छाशक्ति और संघर्ष की पहचान है। सीमित साधनों और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद दिव्यांगजन अपने साहस, मेहनत और आत्मविश्वास से समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनते हैं। वे यह सिद्ध करते हैं कि सफलता के रास्ते शरीर की नहीं, बल्कि मन की मजबूती से तय होते हैं। उनकी उपलब्धियाँ हमें सिखाती हैं कि कठिनाइयाँ रुकावट नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की सीढ़ियाँ होती हैं।
दुनिया भर के दृष्टिहीन लोगों को अक्षर ज्ञान से अवगत कराने वाले लुई ब्रेल का आज के ही दिन 1809 को फ्रांस में जन्म हुआ था।
उनके जीवन ने पूरी दुनिया के दृष्टिहीन लोगों के लिए असाधारण परिवर्तन की राह खोल दी। लुई ने महज तीन वर्ष की आयु में पिता की फैक्ट्री में खेलते हुए आंखों में गंभीर चोट लगने के कारण अपनी दृष्टि खो दी, लेकिन यही कठिनाई उनके जीवन का उद्देश्य बन गई। लुई ब्रेल मेधावी थे। उन्हें पेरिस के 'रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर द ब्लाइंड' में पढ़ने का अवसर मिला, जहां उन्होंने महसूस किया कि दृष्टिहीन छात्रों के लिए पढ़ना-लिखना कितना कठिन है।
उस समय उभरी हुई अक्षरों वाली पुस्तकें महंगी और सीमित थीं। इसी समस्या का समाधान खोजते हुए ब्रेल ने स्पर्श के आधार पर पढ़ी जाने वाली एक सरल और प्रभावी लिपि विकसित करने का प्रयास शुरू किया।
केवल 16 वर्ष की आयु में लुई ब्रेल ने छह बिंदुओं पर आधारित 'ब्रेल लिपि' विकसित कर ली। यह प्रणाली इतनी सहज थी कि उंगलियों के स्पर्श से अक्षर, शब्द और वाक्य आसानी से पहचाने जा सकते थे।