नागपुर । प्रा.विवेक बांबल । लोकतंत्र की सबसे बड़ी प्रक्रिया चुनाव को सफल बनाने के लिए शिक्षकों को प्रशासनिक ड्यूटी पर लगाया जाना वर्षों से परंपरा बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या शिक्षा के मंदिरों में ज्ञान बाँटने वाले शिक्षक, अपनी मूल जिम्मेदारी छोड़कर चुनावी व्यवस्था का बोझ उठाने के लिए ही बने हैं? जब शिक्षक कक्षा से बाहर और फाइलों, सूचियों व बूथों के बीच उलझ जाते हैं, तब शिक्षा की निरंतरता और गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है। यही कारण है कि अब यह बहस तेज हो गई है कि शिक्षकों को चुनावी काम से मुक्त कर, उन्हें केवल शिक्षा के कार्य तक सीमित रखा जाना चाहिए।
जब भी चुनाव आता है स्कूलों में शिक्षकों को जबाबदारी सौंपी जाती है ऐसा अधिकारी नियुक्त करने के लिए अलग से कोई प्रशासकीय व आर्थिक प्रावधान नहीं है तो ऐसी हालत में चुनाव आयोग चुनाव आयोग यह काम शिक्षकों की बजाय शिक्षित बेरोजगारों को दे सकता है जिससे उनकी थोड़ी-बहुत कमाई हो जाएगी । शिक्षकों को सर्वेक्षण, स्वाधीनता दिवस व गणतंत्र दिवस पर रैली निकालने, पालतू प्राणियों की गणना करने जैसे कितने ही काम दिए जाते हैं जिसका वीडियो उन्हें अधिकारियों को भेजना पड़ता है । सरल, निपुण जैसे एप को शैक्षणिक बताकर शिक्षकों के मोबाइल में डाउनलोड किया जाता है । नई शिक्षा नीति का काफी प्रचार किया जाता है लेकिन शिक्षकों के प्रश्नों व समस्याओं को नजरंदाज कर दिया जाता है ।
इससे उनका समय बर्बाद होता है और अध्यापन के काम में व्यवधान आता है । अनेक शैक्षणिक संस्थाओं में स्थायी नियुक्ति न करते हुए तदर्थ शिक्षक रखे जाते हैं । सारी योग्यताओं के बाद भी संस्थाओं के कर्ताधर्ता मोटी रकम लेकर ही शिक्षक की नियुक्ति करते हैं । सब कुछ जानने पर भी कोई जांच या कार्रवाई नहीं की जाती ।