नागपुर । एड अब्दुल अमानी कुरेशी। मानवाधिकारों के संरक्षण और सामाजिक न्याय को लेकर आयोजित एक विचारोत्तेजक परिसंवाद में वक्ताओं ने मानवअधिकारों की समझ और उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया। 
ज्ञानशक्ति सेवा फाऊंडेशन नईदिल्ली की ओर से आयोजित मानवाधिकार विषय पर परिसंवाद का आयोजन रातुम नागपुर विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ साइकोलॉजी में किया गया था। ज्ञान शक्ति सेवा फाऊंडेशन के संस्थापक डाॅ परमानंद शुक्ला के मार्गदर्शन में यह कार्यक्रम डिपार्टमेंट ऑफ साइकोलॉजी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ जिसके आयोजनकर्ता एड.अब्दुल अमानी कुरेशी थे । कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष डॉ.सुबोध बनसोड ने की ।
प्रमुख वक्ता के रूप मे डॉ.शैलेन्द्रकुमार(भाषाविभागाध्यक्ष ) तथा प्रमुख अतिथि के रूप में प्रा. नीरज नकाते, प्रा.हिमांशु लोखंडे, प्रा.एपी अमन ,रोहीदास राठौड़ (वरीष्ठ लिपीक) भाषा शास्त्र विभाग, प्रा.ओम चौधरी,भाषा शास्त्र विभाग तथा प्रा. तजिंदर सिंघ प्रमुखता से मंच पर उपस्थित थे।
परिसंवाद में प्रा. हिमांशु लोखंडे ने कहा कि मानवाधिकार को केवल कानून की किताबों तक सीमित न रखे, बल्कि आम नागरिक के जीवन में उनका वास्तविक प्रभाव दिखाई देना चाहिए।
डाॅ शैलेन्द्र कुमार ने अपने संबोधन में कहा शिक्षा, संवेदनशीलता और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से ही मानवाधिकारों की रक्षा संभव है।
“आज आवश्यकता है कि मानवाधिकारों को केवल चर्चा का विषय न बनाकर, ज़मीनी स्तर पर लागू किया जाए। जागरूक नागरिक ही शोषण और अन्याय के खिलाफ सबसे बड़ी ताकत होते हैं।”
प्रा. निरज नखाते ने कहा
“मानवाधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब प्रशासन, समाज और नागरिक एकजुट होकर कार्य करें। शिक्षा और संवेदनशीलता से ही अधिकारों के प्रति चेतना विकसित की जा सकती है।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मानसशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.सुबोध बनसोड ने कहा कि मानवाधिकार हर इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार हैं। ये अधिकार हमें सम्मान के साथ जीने, अपनी बात कहने, समानता पाने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की ताक़त देते हैं। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय, स्वतंत्रता और गरिमा नहीं पहुँचती, तब तक मानवाधिकारों की रक्षा की लड़ाई अधूरी रहेगी।”
मंच संचालन एड. अब्दुल अमानी कुरेशी ने किया।प्रोफेसर तजींदर सिंघ“ ने आभार प्रकट करते हुए कहा कि परिसंवाद की सफलता सभी अतिथियों, वक्ताओं और उपस्थित जनसमूह के सहयोग से संभव हुई। मानवाधिकारों पर यह विचार विमर्श समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनेगा।”