उत्तरप्रदेश | न्यूज़ डेस्क | यह मामला उसैहत थाने का था | इसमें तत्कालीन एसएचओ अजय पाल सिंह का तर्क था कि इन महिलाओं के ख़िलाफ़ इसलिए कार्रवाई की गई, क्योंकि उनके नाबालिग़ बच्चों पर एक नाबालिग़ लड़की से छेड़छाड़ का आरोप था | एसएचओ ने उस समय मीडिया से कहा था कि माता-पिता ने बच्चों को "अच्छे संस्कार नहीं दिए हैं, इसलिए यह कार्रवाई की गई है | "
बदायूं के एसएसपी बृजेश सिंह के पीआरओ अश्विनी कुमार के मुताबिक़, थाना प्रभारी को जांच और शिकायतों में लापरवाही बरतने के आरोप में लाइन हाज़िर कर दिया गया है | हालांकि यह कार्रवाई मुरादाबाद के डीआईजी अजय साहनी की समीक्षा बैठक के बाद की गई थी | वहीं बच्चों की जगह उनके माता-पिता को गिरफ़्तार करने से जुड़े सवाल पर पुलिस की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं दिया गया है |
क्या है मामला
उसैहत थाना क्षेत्र में बीते एक माह के दौरान नाबालिग़ों से जुड़े तीन बड़े मामले सामने आए, जिनमें आरोप बच्चों पर लगे, लेकिन पुलिस ने उनके माता-पिता या परिजनों को जेल भेज दिया | इन मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या पुलिस क़ानून के अनुसार कार्रवाई कर रही थी, या फिर अपने स्तर पर "संदेश देने" के नाम पर दंडात्मक रवैया अपना रही थी |
यह मामला 17 दिसंबर का है | थाना क्षेत्र में कक्षा आठ की एक छात्रा के पिता ने शिकायत दर्ज कराई कि गांव के चार नाबालिग़ लड़कों ने उसकी बेटी पर अश्लील टिप्पणियां कीं और छेड़छाड़ की | पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो एक्ट के तहत मुक़दमा दर्ज किया | हालांकि, आरोपी बच्चे 13 वर्ष से कम उम्र के थे, इसलिए उन्हें हिरासत में नहीं लिया गय |
इसके बजाय पुलिस ने उनके परिवारों को नोटिस जारी किए और बाद में चारों लड़कों की माताओं को गिरफ़्तार कर लिया | पुलिस ने इन महिलाओं को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 170 (गंभीर संज्ञेय अपराध को पहले से रोकना) के तहत निवारक कार्रवाई में गिरफ़्तार किया | उन्हें उपज़िलाधिकारी की अदालत में पेश किया गया, जहां से निजी मुचलके पर उन्हें उसी दिन रिहा कर दिया गया | इस मामले में विवाद उस समय खड़ा हुआ, जब तत्कालीन एसएचओ अजय पाल सिंह ने मीडिया से कहा कि नाबालिग़ बच्चे "बदतमीज़ और शरारती" हैं और उनके माता-पिता ने उन्हें "अच्छे संस्कार नहीं दिए हैं | "
उन्होंने यह भी कहा कि माता-पिता पर कार्रवाई इसलिए की गई, ताकि समाज में एक संदेश जाए | एसएचओ के इस बयान को क़ानूनी जानकारों और सामाजिक संगठनों ने क़ानून की भावना के ख़िलाफ़ बताया | पुलिस से सवाल पूछे जा रहे हैं कि "अच्छे संस्कार" तय करने का अधिकार पुलिस को किसने दिया है | क्या माता-पिता को बच्चों की कथित हरकतों के लिए जेल भेजा जा सकता है |
पहले भी हुए ऐसे मामले
यह पहला मामला नहीं थ | इससे पहले 22 नवंबर को क़स्बे के स्कूल में कक्षा सात-आठ की छात्राओं की पानी की बोतलों में कथित तौर पर पेशाब भरने और स्कूल की दीवारों पर अश्लील शब्द लिखने की घटना सामने आई थी | आरोप चार नाबालिग़ लड़कों पर लगे और मुक़दमा भी उन्हीं के ख़िलाफ़ दर्ज हुआ था, लेकिन पुलिस ने उन नाबालिग़ों के पिताओं को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया था | इसी तरह 12 दिसंबर को प्रधानमंत्री की तस्वीर से छेड़छाड़ और उस पर अभद्र टिप्पणी लिखने के मामले में आरोप एक नाबालिग़ छात्रा पर लगा, लेकिन पुलिस ने छात्रा के भाई को जेल भेज दिया |
हालांकि, इन तीनों मामलों में गिरफ़्तार किए गए लोगों से फ़ोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन किसी ने भी कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया है | इसके बावजूद पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं | मामले ने उस समय राजनीतिक तूल पकड़ लिया, जब समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने पुलिस प्रशासन और राज्य सरकार पर निशाना साधा | विपक्ष का आरोप है कि नाबालिग़ों से जुड़े संवेदनशील मामलों में पुलिस क़ानून की समझ और मानवीय दृष्टिकोण, दोनों में विफल रही है | समाजवादी पार्टी के बदायूं ज़िलाध्यक्ष आशीष यादव ने आरोप लगाया, "बीजेपी सरकार में गुंडाराज चरम पर है | पुलिस कंफ्यूज़ है कि किस पर कार्रवाई करनी है और किस पर नहीं बेगुनाहों पर कार्रवाई हो रही है. महिलाओं और बच्चों तक को बेवजह जेल भेजा जा रहा है | "
उन्होंने कहा कि सिर्फ़ एसएचओ को हटाने से काम नहीं चलेगा, जब आला अधिकारियों को जानकारी थी, तो जवाबदेही उनकी भी बनती है | विवाद बढ़ने के बाद पुलिस मुख्यालय स्तर से पूरे प्रकरण की रिपोर्ट तलब की गई है | बीजेपी के ज़िलाध्यक्ष राजीव गुप्ता का कहना है कि प्रकरण संज्ञान में आया है और जानकारी ली जा रही है | उन्होंने कहा, "जहां तक क़ानून व्यवस्था की बात है, यूपी में क़ानून-व्यवस्था बेहतर है. अपराधी और माफ़िया भूमिगत हो गए हैं | बहन-बेटियों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाला कोई भी हो, बच नहीं सकता | विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए वे अनर्गल आरोप लगाते रहते हैं | "