डॉ. अशोक कुमार वर्मा । महिला समानता दिवस प्रत्येक वर्ष 26 अगस्त को मनाया जाता है। यह दिवस महिलाओं को समान अधिकार, समान अवसर, स्वतंत्रता, सम्मान और न्याय प्रदान करने की भावना को सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण अवसर है। किसी भी राष्ट्र की उन्नति केवल उसकी आर्थिक समृद्धि से नहीं, बल्कि इस बात से भी मापी जाती है कि वहां महिलाओं को समाज में कितना सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर प्राप्त है। जिस समाज में नारी शिक्षित, स्वावलंबी, सुरक्षित और आत्मनिर्भर होती है, वह समाज अधिक सशक्त, सभ्य और प्रगतिशील बनता है। भारतीय संस्कृति में नारी को सदैव सम्मान का स्थान दिया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।” अर्थात जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवताओं का निवास माना जाता है। भारतीय इतिहास में अनेक ऐसी विदुषी और वीरांगनाएं हुई हैं, जिन्होंने अपने ज्ञान, साहस, त्याग और पराक्रम से समाज तथा राष्ट्र को नई दिशा प्रदान की। गार्गी, मैत्रेयी, रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले और अनेक महान महिलाओं ने यह सिद्ध किया कि प्रतिभा और सामर्थ्य का संबंध स्त्री या पुरुष होने से नहीं, बल्कि अवसर और परिश्रम से होता है।
महिला समानता का वास्तविक अर्थ पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करना नहीं, बल्कि महिलाओं को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समान अवसर और अधिकार प्रदान करना है। शिक्षा इसका सबसे महत्वपूर्ण आधार है। यदि किसी बालिका को शिक्षा से वंचित किया जाता है तो केवल उसका ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज का विकास प्रभावित होता है। शिक्षित महिला अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है, परिवार को बेहतर दिशा देती है और आने वाली पीढ़ी को संस्कार तथा ज्ञान प्रदान करती है। इसलिए प्रत्येक बालिका को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का समान अवसर मिलना चाहिए। समानता की शुरुआत परिवार से होती है। आज भी कहीं-कहीं पुत्र और पुत्री के बीच भेदभाव देखने को मिलता है। पुत्र के जन्म पर प्रसन्नता और पुत्री के जन्म पर चिंता की मानसिकता को समाप्त करना आवश्यक है। बेटियों को भी बेटों के समान शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, संपत्ति, निर्णय लेने और अपने जीवन का मार्ग चुनने के अवसर मिलने चाहिए। बेटी किसी परिवार की जिम्मेदारी मात्र नहीं, बल्कि परिवार और राष्ट्र की अमूल्य शक्ति है। इस पर कुछ काव्य पंक्तिया इस प्रकार हैं 
पुत्र-पुत्री एक समान, उनको दो पूरा हक़ और मानपुत्र कभी ना सेवा करता, मात-पिता से दूर है हटता पुत्री जब ससुराल है जाती, मात-पिता को ना भुला पाती जब मात-पिता पर दुःख कोई आता, नंगे पैरो दोड़ी आती उनकी सेवा में लगकर, अपना सुख-आराम सब भूल जाती तब मात-पिता को यह अक्ल आती,पुत्री ही है अपना सच्चा धन सुख-दुःख में रहती जो सदा संग तुम भी सुनो दुनिया के लोगो, पुत्री को तुम बोझ न मानो जो भी है तुम्हारे पास पुत्री को भी दो, ना करो उसे कभी निराश वो तो कभी न कुछ मांगेगी, हमेशा ही तुम्हे कुछ देना चाहेगी । फिर भी तुम हो कितने भोले, पुत्र को सब कुछ दे देते । पुत्री को कहते पराया धन अब तो छोडो रीत पुरानी, पुत्री को ना मानो पुत्र से कम
महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता भी समानता का महत्वपूर्ण आधार है। जब महिला अपने पैरों पर खड़ी होती है तो उसके आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और वह परिवार तथा समाज के निर्णयों में प्रभावी भूमिका निभा पाती है। आज महिलाएं प्रशासन, न्यायपालिका, चिकित्सा, शिक्षा, विज्ञान, कृषि, उद्योग, सेना, पुलिस, खेल, कला और राजनीति सहित प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं। उनकी उपलब्धियां यह प्रमाणित करती हैं कि अवसर मिलने पर महिलाएं किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकती हैं। महिला समानता के मार्ग में दहेज प्रथा, बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या, अशिक्षा, घरेलू हिंसा, लैंगिक भेदभाव और महिलाओं के प्रति असम्मान जैसी सामाजिक बुराइयां बड़ी बाधाएं हैं। इन कुरीतियों को केवल कानून के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए सामाजिक चेतना और मानसिकता में परिवर्तन आवश्यक है। प्रत्येक परिवार, विद्यालय, सामाजिक संस्था और नागरिक को अपनी भूमिका निभानी होगी।
महिलाओं की सुरक्षा भी समानता का अनिवार्य हिस्सा है। किसी भी महिला को भय के वातावरण में जीवन व्यतीत करने के लिए विवश नहीं होना चाहिए। घर से लेकर कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थानों तक महिलाओं को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार केवल किसी विशेष दिवस तक सीमित न रहकर हमारे दैनिक जीवन का संस्कार बनना चाहिए। महिला समानता का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि पुरुषों को इस परिवर्तन में सहभागी बनाया जाए। समानता केवल महिलाओं का विषय नहीं है। पुरुष और महिलाएं परिवार तथा समाज के दो महत्वपूर्ण आधार हैं। दोनों के सहयोग से ही स्वस्थ और संतुलित समाज का निर्माण संभव है। पुरुषों को भी बेटियों की शिक्षा, महिलाओं के सम्मान और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम महिला समानता दिवस को केवल एक औपचारिक अवसर के रूप में न मनाएं, बल्कि इसे आत्ममंथन और संकल्प का दिवस बनाएं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी बालिका के सपनों पर उसके लिंग के कारण रोक न लगे, किसी महिला को उसकी योग्यता के बावजूद अवसर से वंचित न किया जाए और किसी नारी के सम्मान से समझौता न हो। अंततः महिला समानता दिवस हमें यह संदेश देता है कि नारी को समान अधिकार देना केवल महिलाओं का सम्मान नहीं, बल्कि मानवता का सम्मान है। जिस दिन समाज में बेटी और बेटे के बीच भेदभाव समाप्त होगा, महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के समान अवसर मिलेंगे तथा प्रत्येक नारी सुरक्षित और सम्मानित जीवन जी सकेगी, उसी दिन वास्तविक समानता की स्थापना होगी। आइए, 26 अगस्त को हम संकल्प लें कि अपने परिवार और समाज में किसी भी प्रकार के लैंगिक भेदभाव का विरोध करेंगे, बेटियों को आगे बढ़ने के समान अवसर देंगे और ऐसा भारत बनाने में योगदान देंगे जहां नारी केवल सम्मान की अधिकारी न हो, बल्कि समान अधिकार और अवसर के साथ राष्ट्र निर्माण में पूर्ण भागीदारी निभाए।