रायपुर | रमेश कुमार "रिपु" | समय बदला, तो रावण का रूप भी बदला। इन दिनों कई वैरायटी के रावण हैं। तुम्हारे शहर में और मेरे प्रदेश में। अपनी राक्षसी जीवन को तपस्या, अपनी कू्ररता को धर्म और मृत्यु को बलिदान समझने वाले रावण की महिमा को समझने के लिए, व्यक्ति को राम होना होगा। लंका हर जगह मौजूद है। रावण भी हैं। लेकिन राम कहाँ है? अयोध्या को भी पता नहीं है। संसद भी नहीं जानती। केवल राम मंदिर बन जाने से, रावण का अंत हो गया,कहना गलत होगा।
हमारे बीच किस्म किस्म के रावण हैं। भेष बदल कर हमारे बीच रहते हैं। बिहार के चुनाव में अशिक्षा, गरीबी,बेरोजगारी,अन्याय और विषमता का रावण अठ्ठहास कर रहा है। मध्यप्रदेश में कपटी का रावण,जुमले वाले रावण,लोकतंत्र के हत्यारे रावण,सत्ता के भूखे रावण हैं। कुछ लोग ऐसे ही रावण को पूजते हैं। कोई ऐसे रावण के साथ हैं। गर्व कर रहा है। मेघनाथ की तरह गरजने वाले और कुंभकरण की तरह सोने वाले राक्षसी प्रवृति के, लोकतंत्र में बहुत है। दशहरे पर्व में यदि इनमें से किसी एक रावण को भी मार सकें, तो कह सकते हैं कि, ईमानदारी से हमने दशहरा मनाया।
चुनाव जब जब होते हैं अपमान और अनादर करने की होड़ मच जाती है। ऐसा लगता है,कौन कितना किसी की बेइज्जती करने वाले शब्दों का प्रयोग कर सकता है। इसमें भी प्रतिस्पर्धा होती है। किसी का अपमान और अनादर करना भी रावण का गुण है। वैसे हर व्यक्ति में राम और रावण के गुण होते हैं। लेकिन राम के देश में,रावणों की संख्या अधिक है।
देश के विकास में और प्रदेश के विकास में जो रोड़ा अटकाए, उस रावण को भी मारना चाहिए। विकास के नाम पर जो भ्रष्टाचार करे,उस रावण को भी मारें। ऐसे रावण को चुनाव में हरा कर मार देना चाहिए। रावण किसी दूसरे प्रदेश से चलकर नहीं आता। हमारे आस पास है। रावण हमारे रिश्ते में है। हमारे संबंधों में है। उसका स्वरूप तब हमारे सामने आता है,जब वह खलनायिकी करता है। लोगों को चाहिए कि, हर बुराई को मारकर राम की तरह आगे बढ़ें।
यूंँ तो किसी को रावण कहना, लंकेश का अपमान है। इसलिए कि उनके जैसा गुणी,बुद्धिमान और पराक्रमी और जन सेवक आज के रावण है ही नहीं। लंकेश की बुराई को कुछ लोगों ने स्वीकार लिया है। त्रेता में जो रावण था, उसे मारने की परंपरा चली आ रही है। लेकिन अपने अंदर के रावण को कोई मारने की नहीं सोचता। यही वजह है रेप,हत्या,हिंसा,भ्रष्टाचार,आतंक का रावण दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। हमारे बीच भेष बदल कर जो रावण हैं,उन्हें पहचान कर उनका अंत करें। तब नील कंठ के दर्शन का महत्व है।
@रमेश कुमार "रिपु