January 11, 2021

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लोकतंत्र के बाज़ार में खड़ी हिन्दी : सरकारी दोगले पन के फंदे से हिन्दी को निकालना पड़ेगा




रायपुर | रमेश कुमार "रिपु " | सरकारी दोगले पन के फंदे से हिन्दी को निकालना पड़ेगा। देश में हिन्दी अभी भी छोटा बच्चा है, तो इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी मूल वजह है। तुर्की में सिर्फ 12 घंटे में कमालपाशा इसे राज्य भाषा बना देते हैं। लेकिन हमारे देश में आजादी के 70 वर्षो के बाद भी पोस्टर दीवारों में चिपकाना पड़ रहा है सरकारी कार्यालयों में कि, आप हिन्दी में बोलें,हमें अच्छा लगेगा।

हिन्दी देश की भाषा नहीं,संस्कृति है। जाहिर सी बात है संस्कृति को अलग करके देश नहीं चल सकता। हिन्दी को बाजार और साहित्य की आंखों से अलग अलग तरीके से देखना बंद किया जाना चाहिए। इसलिए कि आज साहित्य का बाजार बदल गया है। नई वाली हिन्दी पर जोर दिया जा रहा है। सवाल यह है कि नई वाली हिन्दी आई कहाँ से। अंग्रेजी के मंच पर बैठने वालों ने हिन्दी भाषा को प्रयोगवादी भाषा बना दिया है। हिन्दी भाषा है। देश की धड़कन है। हिन्दुस्तान की पहचान है। तभी तो एक बार बीबीसी को दिये एक साक्षात्कार में महात्मा गांधी ने कहा था,‘‘गांधी सिर्फ हिन्दी बोलता है। कह दो उन सबसे कि, उसे अब अंग्रेजी नहीं आती।’’

हिन्दी भाषा के प्रति गांधी जी का यह मोह था। हिन्दी से उनका लगाव था। हिन्दी को हिन्दुस्तान की पहचान देना जाना चाहते थे,इसीलिए अंग्रेजी को दरकिनार किया। आजादी के बाद राजनीति की वजह से प्रांतीय भाषाओं को सियासी दलों ने तरजीह दिया ताकि उनका वोट बैक जिंदा रहे। सोचने वाली बात है कि प्रांतीय बोली में लिखा गया साहित्य सिर्फ एक राज्य तक सीमट कर रह जायेगा। देश में हिन्दी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। हिन्दी में जज्ब करने की क्षमता, अंग्रेजी से पचास गुना ज्यादा है। भावनाओं को समझने की और उसे बयान करने की ताकत अंग्रेजी से कई गुना ज्यादा है। फिर ऐसे में हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा देने या फिर उसे देश की संस्कृति मानने से कोई कैसा इंकार कर सकता है?

विज्ञापन की भाषा को लेकर कई बार बहसें हुई है। वास्तव में विज्ञापन की भाषा बाजार की भाषा है। विज्ञापन की भाषा भी हिन्दी के विकास में सहायक है। फिर समय की यह जरूरत है। बोलियों के तमचे से हिन्दी को डराने की बात करना बेमानी है। इसलिए कि बोलियाँं रहेंगी तो हिन्दी रहेगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि माँ को बेटी बना दिया जाए। हिन्दी राष्ट्र भाषा है। उसे सम्मान और दर्जा दोनों मिलना चाहिए। नई वाली हिन्दी का मंच हो या फिर अंग्रेजी का मंच अथवा बोलियों का मंच। हिन्दी, सभी मंचों पर कही,सुनी जा सकती है।

कुछ लोग कहते हैं कि अख़बार वाले चाहें, तो हिन्दी को आकाश जैसा फैलाव दे सकते हैं। लेकिन वो ऐसा नहीं करते। जैसा कि अमर उजाला ने लिखा कि, ‘‘मेंस फैशन वीक का आगाज’’। जाहिर सी बात है ऐसे शीर्षक में हिन्दी कहांँ है, दिया लेकर ढूंढना पड़ेगा! हिन्दी फिल्मों में भी उर्दू, अंग्रेजी, फारसी,अरबी आदि भाषायें होती हैं। फिर भी हम कह सकते हैं कि हिन्दी गंगा है। जो कई भाषाओं को आत्मसात करके और मीठी हो गई है। आजकल कई आॅफिसों में लिखा होता है,आप हिन्दी में बोलें, हमें अच्छा लगेगा।’’अभी तक सुप्रीम कोर्ट,हाई कोर्ट में हिन्दी में याचिका दायर नहीं की जाती थी। लेकिन अब इसे स्वीकारा जाने लगा है।

विज्ञापन और फिल्में, बाजार की भाषा है। कोर्ट में अंग्रेजी में याचिका दायर करने की पंरपरा,पुरानी मान्यता थी। जिसे अब जरूरी नहीं माना गया। सच तो यह है कि यदि सरकार कहे कि नौकरी और राजकाज की भाषा हिन्दी होगी, तो हिन्दी के उत्थान में बाधा कहीं नहीं आ सकती। हिन्दी को हर मंच पर,हर विधा के कार्यक्रमों में अनिवार्य कर देना चाहिए। हैरानी वाली बात है कि शशि थरूर अंग्रेजी बोलते हैं। अंग्रेजी मे किताबें लिखते हैं। ऐसे लोगों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि हिन्दी भाषा के विकास में ये मदद करेंगे? मुझे हंसी आती थी, जब पी.चिदम्बरम कहते थे कि ‘‘हमें हिन्दी मे काम करना चाहिए।’’बताइये ऐसे राजनीतिक लोग, कितना हिन्दी में काम करते रहे होंगे?ऐसे लोगों की वजह से आज हिन्दी लोकतंत्र के बाजार में खड़ी है।

दरसअल सरकारी दोगले पन के फंदे से हिन्दी को निकालना पड़ेगा। देश में हिन्दी अभी भी छोटा बच्चा है, तो इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी मूल वजह है। तुर्की में सिर्फ 12 घंटे में कमालपाशा इसे राज्य भाषा बना देते है। लेकिन हमारे देश में आजादी के 70 वर्षो के बाद भी पोस्टर दीवारों में चिपकाना पड़ रहा है सरकारी कार्यालयों में कि आप हिन्दी में बोलें,हमें अच्छा लगेगा।

सोचने वाली बात है कि इन सबके बावजूद आज विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिन्दी हैं। हिन्दी पर सवाल वो उठाते हैं, जिनके बच्चे कान्वेंट स्कूल में पढ़ रहे हैं। इनके बच्चे अंग्रेजी बोलते हैं, तो इससे रामचरित मानस या फिर मीरा के पद और प्रेम चंद के साहित्य पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। हर भाषा का संबंध उसे बोलने वालों से होता है। देश से होता है। समाज से होता है। जब कोई भाषा देश की संस्कृति बन जाती है। लोगों की जुबान पर लहू की तरह उसका बहना इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी खूब बोली जाती है। यह अच्छी बात है कि संसद में भी सबसे अधिक हिन्दी अब बोली जाने लगी है।

अंग्रेजी मंच पर बैठे लोग हिन्दी बोलने से सकुचाते हैं, तो यह उनकी समस्या है। भावनाओं को प्रकट करने की जितनी मीठी और सहज भाषा हिन्दी है,उतनी कोई और नहीं। सच तो यह है कि हिन्दी गंगा है,जिसने कई भाषाओं को आत्मसात कर लिया है। हिन्दी के संग उर्दू चलती है,तो ऐसा लगता है, जैसे रेल की दो पातें। नई वाली हिन्दी की वजह से हिन्दी बाजार की भाषा बन रही है,फिर भी मुझे नहीं लगता कि इससे हिन्दी बाजारू बन जायेगी।
@ रमेश कुमार ‘‘रिपु’’



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