February 07, 2026

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खनन क्षेत्र दूरदर्शी पारिस्थितिकीविद् के प्रयासों से बना देशी वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का समृद्ध आवास

बेजान जमीन पर उगाया जंगल




गुरुग्राम | न्यूज़ डेस्क | एनजीओ आइएमगुड़गांव ने देश के अग्रणी पारिस्थितिकी पुनर्जीवन विशेषज्ञ विजय धस्माना को अरावली जैव-विविधता पार्क विकसित करने के लिए पहली बार साल 2011 में आमंत्रित किया था | तब उस जगह की हालत बेहत खराब थी | वह दशकों से खनन, पत्थर-खदानों, पशु-चराने और कचरा फेंकने की वजह से बुरी तरह उजड़ चुका था | 

वे याद करते हैं, ''खनन की भयावहता बेहद गंभीर थी | यह तुरंत साफ हो गया कि केवल साधारण पौधारोपण या दिखावटी हरियाली पर्याप्त नहीं होगी | हमें ऐसे व्यापक विजन की जरूरत थी जिसमें गुरुग्राम की पहचान यानी आकांक्षा की झलक मिले | '' यह दिल्ली-गुरुग्राम की सीमा पर स्थित एक बंद पड़े खनन स्थल पर विकसित किया गया और तकरीबन 392 एकड़ में फैला पुनर्जीवित वन्य क्षेत्र है | आज यह इस इलाके में शहरी पारिस्थितिकी पुनर्जीवन के सबसे बड़े प्रयासों में एक है | 

धस्माना और उनकी टीम ने पारंपरिक हरियाली और सौंदर्यीकरण की बजाए देशी पौधों के समूहों और पारिस्थितिक कार्यप्रणाली के पुनर्जीवन पर ध्यान केंद्रित किया | उनके शब्दों में, ''ये ऐसे तंत्र थे जो जीवन को बनाए रख सकें और वन्यजीवों का आश्रय बन सकें | '' इस नजरिए को लेकर किसी भी तरह के संदेह उस वक्त दूर हो गए जब कभी उजाड़ पड़ी यह जमीन एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र में तब्दील होने लगी | अब यहां 300 से ज्यादा देशी वनस्पति प्रजातियां, गीदड़, नीलगाय और नेवले सरीखी जीवंत वन्यजीव तथा पक्षियों की 180 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं | 

इस परियोजना को 2016 में मान्यता मिली जब आइयूसीएन (अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ) ने एक स्वतंत्र मूल्यांकन में इसे भारत के सबसे उत्कृष्ट पारिस्थितिकी पुनर्जीवन स्थलों में से एक करार दिया | अपनी पारिस्थितिक पद्धति को मिली उस मान्यता के बाद यह पार्क अध्ययन और शोध का जीवंत केंद्र बन गया |  विश्वविद्यालय के छात्र, पीएचडी शोधार्थी, नीति-निर्माता और वन विभाग के प्रशिक्षु यहां की वनस्पतियों, जीव-जंतुओं और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए आने लगे | 

आज इस पार्क का असर उसके भौगोलिक सीमा से कहीं आगे तक महसूस किया जा सकता है | यह हरियाणा के अरावली भूमि पुनर्जीवन कार्यक्रम के लिए एक केस स्टडी के रूप में और शहरी पारिस्थितिक जागरूकता के लिए प्रेरणा है | धस्माना के कार्य की बुनियादी मान्यता यह है कि संरक्षण सबसे ज्यादा मायने रखता है | वे कहते हैं, ''जो कुछ भी बाकी बचा है, उसे हमें बचाना होगा | अपने प्राकृतिक क्षेत्रों की सुरक्षा करके ही वन्य क्षेत्रों को फिर से जीवंत करने का काम शुरू हो सकता है | '' और, इसके साथ यह भी जुड़ा है कि प्रकृति, लचीलेपन और सतत भविष्य को लेकर शहरों की सोच ऐसी ही होनी चाहिए | 

विशेषज्ञ की राय

''अरावली बायोडाइवर्सिटी पार्क जैसी परियोजनाएं जरूरी हैं क्योंकि वे प्राकृतिक तरीके से चलने वाले पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करती हैं | ये तंत्र जलवायु, पानी, मिट्टी की सेहत और जैव-विविधता को संतुलित रखते हैं, जबकि कृत्रिम या दिखावटी हरियाली इन कार्यों को कभी नहीं कर सकते | ''

राकेश खत्री, पर्यावरणविद् आखिर क्यों है यह एक रत्न

  • 392 एकड़ में फैला अरावली बायोडाइवर्सिटी पार्क अपने आसपास के शहरी क्षेत्र के लिए एक कार्बन अवशोषक के रूप में कार्य करता है |
  • इस पार्क में अब बबूल, रौंझ और हिंगोट समेत 300 से ज्यादा देशी पौधों की प्रजातियां, और पक्षियों की 185 प्रजातियां तथा जंगली बिल्ली, कॉमन पाम सिवेट, सियार, साही और नीलगाय सरीखे वन्यजीव पाए जाते हैं | 




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