मुंबई | न्यूज़ डेस्क | यूक्रेन को लेकर रूस और अमेरिका के बीच विवाद बढ़ता ही जा रहा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा पूर्वी यूक्रेन के डोनेत्स्क और लुहांस्क को आजाद देश की मान्यता दिए जाने के बाद विवाद और भड़क गया है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने रूस को जमकर लताड़ा है। लेकिन भारत ने अब तक रूस के विरोध में कुछ नहीं कहा है। भारत ने लगातार कहा है कि सैन्य कार्रवाई किसी के हित में नहीं, बातचीत से ही रास्ता निकलेगा।
भारत क्वाड ग्रुप का एकमात्र ऐसा देश है जो अब तक रूसी गतिविधियों का खुलकर विरोध नहीं कर रहा है। डेरेक ग्रॉसमेन दुनियावी मामलों के जानकार हैं। उन्होंने कहा है कि यूक्रेन को लेकर रूसी आक्रामकता की निंदा नहीं करने का भारत का फैसला बहुत अजीब है। शायद नई दिल्ली को लगता है कि वह मॉस्को को प्रभावित नहीं कर सकता है।
आई थी कि ऑस्ट्रेलिया में हुए क्वाड ग्रुप की बैठक में भारत ने रूस के खिलाफ कुछ भी कहने से इनकार कर दिया था। हालांकि क्वाड ग्रुप के अन्य देशों ने रूसी आक्रामकता के खिलाफ खुलकर विरोध किया था। हालांकि एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत यूक्रेन जैसे मसले के लिए अपने सबसे लंबे सहयोगी के विरोध में नहीं जा सकता है क्योंकि भारत को उम्मीद है कि इस मसले को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जा सकता है।
इंटरनेशनल रिलेशंस की एक्सपर्ट तानवी मदन ने मामले को लेकर कहा है कि रूस ने कई मोर्चे पर भारत की लगातार मदद की है। अभी भी भारतीय सेना में करीब दो तिहाई हथियार रूस के हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि रूस भारतीय हितों को नुकसान नहीं पहुंचा सकता है। चीन के संबंध में मॉस्को नई दिल्ली के बदले बीजिंग का साथ दे सकता है।
तानवी का कहना है कि हाल के सालों में भारत ने रूसी हथियारों से अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश की है। ऐसे में यह साफ है कि रूसी निर्भरता से बचना भारतीय विदेश नीति का एक अहम हिस्सा है। लेकिन वास्तविकता ये है कि भारत के पास बहुत विकल्प नहीं हैं। उन्होंने कहा है कि यूक्रेन को लेकर भारत खुलकर रूस का साथ नहीं देने जा रहा है।