November 06, 2021

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महसूस करें : मैं कृतज्ञ हूँ, अपनी उस दृष्टि के लिए, जिससे मैं अपने भीतर और बाहर दोनों स्वरुप को देख सकती/सकता हूँ




मुंबई | हस्तरेखा तज्ञ विनोद जी | एक बार एक राहगीर यात्रा करने के कारण थक गया। अत: उसने इधर-उधर नज़र दौड़ा कर देखा कि कहीं कोई उपयुक्त स्थान मिल जाएँ, जहाँ रुककर वह कुछ समय के लिए विश्राम कर सके।

एकाएक उसकी दृष्टि सामने एक आश्रम पर जाकर ठहर गई। वह संत सुकरात का आश्रम था। पथिक सोचने लगा, यदि यहाँ कुछ दिन ठहरने का अवसर मिल जाए तो कितना अच्छा हो। मैं भी सत्संग-प्रवचनों का लाभ उठा सकूँगा। यही सोचकर वह संत सुकरात के पास पहुँचा। सुकरात ने तुरन्त आज्ञा दे दी और उस व्यक्ति को ठीक अपने सामने वाले कमरे में ठहरा दिया।

एक दिन राहगीर अपने कमरे से निकला, तो क्या देखा? सुकरात अपने कमरे में आइना देख रहे थे। राहगीर बिना किसी प्रतिक्रिया के आगे बढ़ गया। पर दोबारा, तिबारा, राहगीर ने फ़िर से वहीं घटना देखी। अब राहगीर बिना विचार किए नहीं रह सका। सोचने लगा-सुकरात इतने कुरूप हैं। फ़िर रोज़-रोज़ इतनी देर तक आईने में क्या निहारते है?

इस विचार का तूफ़ान उसके भीतर करवटे लेने लगा। वह अपने आपको रोक नहीं पाया। सीधा संत सुकरात के कमरे में पहुँच गया।

राहगीर-"बुरा न माने, तो एक प्रश्न पूछूं। आप प्रतिदिन इतना समय आईने के आगे खड़े होकर क्या देखते हो? आप तो इतने…"

सुकरात-"हाँ, मैं कुरूप हूँ, बदसूरत हूँ, लेकिन मैं प्रतिदिन इसलिए आइना देखता हूँ, ताकि मुझे अपनी कुरूपता का ध्यान रहे।"

राहगीर-"आप अपनी कुरूपता का स्मरण क्यों रखना चाहते हो? क्या अपनी रूपहीनता देखकर आपके भीतर हीनता पैदा नहीं होती?"

सुकरात-"नहीं! क्योंकि मैं नकारात्मक नहीं सोचता। मेरी कुरूपता तो मुझे बोध कराती हैं।"

राहगीर-"बोध! कैसा बोध?"

सुकरात-"यही कि अपने नेक व सुंदर कार्यो से अपनी असुन्दरता को समाप्त कर लूँ।"

उच्च विचार व शुभ कर्म मनुष्य के भीतरी सौंदर्य को निखारते है। यदि भीतरी सौंदर्य पैदा हो गया, तो शरीरी असुंदरता दुःख नहीं देती।

राहगीर संत सुकरात के विचारों से भाव-विभोर हो गया। चरणों में गिरकर प्रणाम किया, उठा और मुड़कर कमरे से बाहर जाने लगा। संत सुकरात का तुरन्त स्वर उभरा-"सुनो वत्स, तुम भी दर्पण देखा करों।"

राहगीर धीमी आवाज़ में बोला- "जी"।

सुकरात-"जानना चाहोंगे, क्यों? क्योंकि तुम अत्यंत रूपवान हो, बहुत सुंदर हो। दरअसल, आइना तुम्हें भी सीख देगा। बताएगा जितना सुंदर तुम्हारा रूप हैं, तुम उतने ही सुंदर कर्म भी करो।

बाहरी और भीतरी-दोनों प्रकार के सौंदर्य के स्वामी बनों। भीतरी सौंदर्य के बिना केवल बाह्य सौंदर्य खोखला हैं, अपूर्ण है।

सच में, हम चाहे तो जीवन की हर प्रतिकूलता के बीच स्वयं को सकारात्मक भावो / विचारों से प्रेरित कर सकते हैं। यही आंतरिक सौंदर्य को प्रकट करने का रहस्य हैं।




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सोनम कौर भाटिया

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