मुंबई | हस्तरेखा तज्ञ विनोद जी | आज शारदीय नवरात्रि की आज महाअष्टमी तिथि है| अष्टमी पर मां दुर्गा के 8वें स्वरूप माता महागौरी की उपासना की जाती है| माता अपने भक्तों के लिए अन्नपूर्णा का स्वरूप हैं| इसलिए मां के भक्त अष्टमी के दिन कन्याओं का पूजन और सम्मान करते हुए महागौरी की कृपा प्राप्त करते हैं| कई लोग अष्टमी तिथि पर नवरात्रि के व्रत का समापन करते हैं. इस दिन भक्त हवन भी करते हैं| आइए, जानते हैं हवन करने का शुभ मुहूर्त, हवन की विधि, मंत्र और आरती
हवन का शुभ मुहूर्त
शाम 7 बजकर 42 मिनट से रात 8 बजकर 7 मिनट तक
हवन की विधि
– हवन करने से पहले स्नान करें|
– साफ-सुथरे कपड़े पहनें|
– मंदिर को साफ कर, गंगा जल छिड़कें|
– हवन कुंड के चारों तरफ सफाई करें|
– हवन करने के पहले पूजन और हवन सामग्री एकत्रित कर लें|
– अपने सिर को ढक लें|
– हवन के लिए लकड़ियों को हवन कुंड में विधि अनुसार रखें|
– अब कपूर की मदद से अग्नि प्रज्जवलित करें,
– मंत्रों के उच्चारण के साथ हवन करें
ॐ आग्नेय नम: स्वाहा
ॐ गणेशाय नम: स्वाहा
ॐ गौरियाय नम: स्वाहा
ॐ नवग्रहाय नम: स्वाहा
ॐ दुर्गाय नम: स्वाहा
ॐ महाकालिकाय नम: स्वाहा
ॐ हनुमते नम: स्वाहा
ॐ भैरवाय नम: स्वाहा
ॐ कुल देवताय नम: स्वाहा
ॐओम स्थान देवताय नम: स्वाहा
ॐ ब्रह्माय नम: स्वाहा
ॐ विष्णुवे नम: स्वाहा
ॐ शिवाय नम: स्वाहा
ॐ जयंती मंगलाकाली, भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा
स्वधा नमस्तुति स्वाहा
ॐ ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: शशि भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु स्वाहा
ॐ गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवा महेश्वर: गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा
ॐ शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे, सर्व स्थार्ति हरे देवि नारायणी नमस्तुते
इसके बाद नारियल/गोले पर कलावा बाधें| पान, सुपारी, लौंग, बतासा, पूरी, खीर आदि उसके शीर्ष पर रखें| इसके बाद इसे हवन कुंड में बीच रख दें| अब बची हुई हवन सामग्री के साथ पूर्ण आहुति दे दें|
पूर्ण आहुति मंत्र
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदम् पुर्णात पूण्य मुदच्यते, पुणस्य पूर्णमादाय पूर्णमेल विसिस्यते स्वाहा
अब माता महागौरी की आरती करें|
मां महागौरी की आरती
जय महागौरी जगत की माया।
जया उमा भवानी जय महामाया।।
हरिद्वार कनखल के पासा।
महागौरी तेरा वहां निवासा।।
चंद्रकली और ममता अम्बे।
जय शक्ति जय जय मां जगदम्बे।।
भीमा देवी विमला माता।
कौशिकी देवी जग विख्याता।।
हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा।
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा।।
सती ‘सत’ हवन कुंड में था जलाया।
उसी धुएं ने रूप काली बनाया।।
बना धर्म सिंह जो सवारी में आया।
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया।।
तभी मां ने महागौरी नाम पाया।
शरण आनेवाले का संकट मिटाया।।
भक्ति भाव से जो तेरी पूजा जो करता।
मां बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता।।
भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।
महागौरी मां तेरी हरदम ही जय हो।।