भागम भाग- जीवन दौड़ नहीं
भागम भाग, भागम भाग,
एक इधर, दूजा उधर।
जा रहा है न जाने किधर,
निकाल रहा बस किलोमीटर।
आने-जाने में बीती उम्र,
न मिली मंज़िल, न मिला शिखर।
सपनों की गठरी कंधों पर,
ढ़ोता रहा मस्तिष्क प्रखर।
एक आ रहा, दूजा जा रहा,
हाटों पर मेला सजा सजा।
एक ने लिया दूजे ने दिया,
व्यवहार व्यापार बना रहा।
प्रातःकाल में दौड़ शोर,
रात्रि थकन प्रचुर घोर।
जीवन बना जी का जंजाल,
सिर पर रहा न एक भी बाल।
धन, पद, यश की चाह में,
मन का दीप हुआ मंद।
मन माया लालसा धर,
छूट गया अपनों का घर।
भागम भाग, भागम भाग,
कब ठहरेगा यह सफर?
कभी तो सोच ले भोले मन,
क्या पाया तूने इस डगर?
जीवन केवल दौड़ नहीं है,
यह अनुभूति का है समुंदर।
जो ठहर कर खुद को जान ले,
वही पा ले सच्चा शिखर।
भागम भाग से ऊपर उठकर,
कर ले चित स्थिर मन चंचल।
तभी सफल होगा जीवन,
शून्य से बढ़ शुभकर्मण फल।
रचयिता- डॉ. अशोक कुमार वर्मा