डॉ. अशोक कुमार वर्मा | यदि नशा मनुष्य के लिए तनिक भी अच्छा होता, तो सबसे पहले माँ अपने लाड़ले को गोद में उठाकर बड़े स्नेह से कहती—“ले, खा ले मेरे बच्चा।” पिता अपने बेटे को समझाते—“थोड़ी ले-पी ले, इसी में जिंदगी का असली मज़ा है, क्यों इतनी चिंता करता है।” गुरु अपने शिष्यों को नशे का पाठ पढ़ाते और कहते—“यही जीवन का आनंद है, इसी से परम सुख की अनुभूति होती है।” विद्यालयों, महाविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में नशे का खुला प्रचार-प्रसार होता और समाज इसे प्रगति, आधुनिकता और खुले विचारों का प्रतीक मानता।
लेकिन ऐसा कहीं नहीं होता, क्योंकि नशा अच्छा नहीं, नाश का दूसरा नाम है। यही कारण है कि माँ अपने बच्चे को नशे से ही नहीं, बल्कि दवा तक देने में सावधानी बरतती है। पिता अपने खून-पसीने की कमाई बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य पर खर्च करता है, न कि उन्हें नशे की आग में झोंकने के लिए। गुरु का उद्देश्य जीवन को संवारना होता है, उसे अंधकार की ओर धकेलना नहीं। संसार के सभी धर्मों, शास्त्रों और संस्कृतियों ने नशे को पतन, विनाश और आत्मविनाश का मार्ग बताया है।
इसके बावजूद आज नशे की समस्या विकराल और भयावह रूप धारण कर चुकी है। यह केवल भारत की समस्या नहीं रही, बल्कि विश्व के लगभग सभी देश इससे जूझ रहे हैं। वैश्वीकरण, बाज़ारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति ने नशे को एक उत्पाद के रूप में स्थापित कर दिया है। आधुनिकता, भौतिकता और तथाकथित दिखावटी जीवन-शैली के नाम पर नशे को “स्टेटस सिंबल” और “कूल कल्चर” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है—वही युवा, जिन पर किसी भी राष्ट्र का वर्तमान और भविष्य निर्भर करता है।
युवा अवस्था ऊर्जा, सपनों और असीम संभावनाओं की अवस्था होती है। यही वह समय होता है जब व्यक्ति अपने जीवन की दिशा, उद्देश्य और मूल्य निर्धारित करता है। किंतु दुर्भाग्यवश आज यही अवस्था नशे की प्रयोगशाला बनती जा रही है। सिगरेट और शराब से शुरू होकर गांजा, चरस, अफीम, हेरोइन, कोकीन और सिंथेटिक ड्रग्स तक—नशे के नए-नए रूप युवाओं को आकर्षित करने के लिए चोरी-छिपे ही नहीं, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
सोशल मीडिया, वेब-सीरीज़, फिल्मों और डिजिटल मंचों पर नशे को फैशन, विद्रोह और आधुनिक सोच के प्रतीक के रूप में दिखाया जा रहा है। नायक-नायिकाओं के हाथों में नशे का चित्रण इस प्रकार किया जाता है मानो यह तनाव से मुक्ति और आत्मविश्वास का स्रोत हो। इसका परिणाम यह होता है कि युवाओं के मन में यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि नशा करना खुले विचारों और आधुनिक जीवन-शैली का प्रमाण है, जबकि सच्चाई यह है कि नशा स्वतंत्रता नहीं, बल्कि गुलामी की पहली सीढ़ी है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस गंभीर सामाजिक समस्या पर गहरी चिंता व्यक्त की है। माननीय न्यायमूर्ति श्री बी. वी. नागरत्ना एवं माननीय न्यायमूर्ति श्री एन. कोटिश्वर सिंह ने ड्रग तस्करी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि “नशे में डूबने का अर्थ ‘कूल’ होना नहीं है और इससे बचना चाहिए।” न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि नशे की लत युवाओं पर सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से अत्यंत घातक प्रभाव डालती है। यह युवाओं की चमक, उनका तेज, उनकी रचनात्मकता, आत्मविश्वास और भविष्य की संभावनाओं को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है।
आज भौतिकवाद के इस दौर में प्रतिबंधित नशों अर्थात ड्रग्स को मनोरंजन का साधन मान लिया गया है, जो अत्यंत चिंताजनक प्रवृत्ति है। प्रारंभ में ड्रग्स व्यक्ति को एक काल्पनिक सुख और राहत का अनुभव कराते हैं। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि वह संसार की सभी चिंताओं, तनावों और असफलताओं से मुक्त होकर किसी अन्य ही दुनिया में विचरण कर रहा है। उसे लगता है कि समस्याएँ समाप्त हो गई हैं और जीवन सरल हो गया है। किंतु यह सुख क्षणिक, कृत्रिम और छलावे से अधिक कुछ नहीं होता।
जैसे ही नशे का प्रभाव समाप्त होता है, शरीर और मस्तिष्क तीव्र पीड़ा, बेचैनी, अवसाद और गहरे खालीपन से भर जाते हैं। मन और शरीर दोनों पुनः उसी नशे की माँग करने लगते हैं। इस पीड़ा से राहत पाने के लिए व्यक्ति फिर से नशे का सहारा लेता है और यहीं से एक खतरनाक चक्र आरंभ होता है। धीरे-धीरे नशा आवश्यकता बन जाता है, आवश्यकता मजबूरी में बदल जाती है और मजबूरी अंततः लत का रूप लेकर पूरे जीवन को जकड़ लेती है।
इस लत का दुष्परिणाम केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। परिवार टूटते हैं, रिश्तों में अविश्वास और तनाव पनपता है, आर्थिक स्थिति चरमराती है और सामाजिक प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है। माँ-बाप का भरोसा टूटता है, भाई-बहन असहाय महसूस करते हैं और पूरा परिवार मानसिक पीड़ा से गुजरता है। नशे की लत व्यक्ति को अपराध की ओर धकेलती है। चोरी, झूठ, धोखाधड़ी, हिंसा और अन्य आपराधिक गतिविधियाँ इसी की उपज हैं। अनेक अपराध केवल इसलिए घटित होते हैं क्योंकि व्यक्ति नशे की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है।
नशा मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव डालता है। अवसाद, चिंता, चिड़चिड़ापन, आत्महत्या की प्रवृत्ति और गंभीर मानसिक विकार नशे से गहराई से जुड़े हुए हैं। कितने ही युवा असमय मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं और कितनों का जीवन हमेशा के लिए अंधकारमय हो जाता है। एक प्रतिभाशाली छात्र, एक होनहार खिलाड़ी, एक संवेदनशील कलाकार या एक जागरूक नागरिक—नशे की भेंट चढ़कर केवल आँकड़ों में बदल जाता है।
यह समझना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि नशा किसी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि स्वयं सबसे बड़ी समस्या है। जीवन की चुनौतियों से भागने का यह मार्ग नहीं, बल्कि उन्हें और जटिल बनाने का माध्यम है। सच्चा साहस नशे में डूबने में नहीं, बल्कि नशे को ठुकराकर संघर्षों का सामना करने में है। सच्ची आधुनिकता आत्मसंयम, आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता में निहित है, न कि आत्मविनाश में।
नशे के विरुद्ध लड़ाई केवल कानून के सहारे नहीं जीती जा सकती। कानून आवश्यक है, किंतु पर्याप्त नहीं। इसके लिए परिवार, शिक्षक, समाज, प्रशासन और सरकार—सभी को मिलकर निरंतर, समन्वित और संवेदनशील प्रयास करने होंगे। परिवार में खुला संवाद और भावनात्मक जुड़ाव, विद्यालयों में मूल्य-आधारित शिक्षा, समाज में सकारात्मक वातावरण और सरकार द्वारा प्रभावी नशामुक्ति व पुनर्वास कार्यक्रम—इन सभी का संतुलित समन्वय अनिवार्य है।
बच्चों को बचपन से ही यह सिखाना होगा कि जीवन का वास्तविक आनंद स्वास्थ्य, परिश्रम, अनुशासन, खेल, कला, साहित्य और रचनात्मक गतिविधियों में निहित है। युवाओं को अवसर, मार्गदर्शन और विश्वास दिया जाना चाहिए, ताकि वे नशे की ओर नहीं, निर्माण और राष्ट्र-निर्माण की ओर अग्रसर हों। नशामुक्ति अभियानों को केवल औपचारिकता न बनाकर जन-आंदोलन का स्वरूप देना समय की माँग है।
अंततः यह सत्य बार-बार दोहराने की आवश्यकता है कि यदि नशा वास्तव में अच्छा होता, तो माँ अपने बच्चे को उससे बचाने के लिए इतना संघर्ष न करती। पिता अपनी पूरी उम्र समझाने में न लगा देता। गुरु चेतावनी न देते। समाज इसे कलंक न मानता।इसलिए यह पंक्ति केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक, नैतिक और मानवीय सत्य है |