नागपुर । प्रा विवेक बांबल। उच्च शिक्षा को केवल डिग्री तक सीमित न रखकर कौशल, नवाचार और मानवीय मूल्यों से जोड़ा जाना एक महत्वपूर्ण कदम है।शिक्षा में हो रहे बदलाव से छात्रों में आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करने में फल मिलेगा । डिजिटल तकनीक और अनुसंधान को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना समय की मांग है । 
उद्योग और समाज की वास्तविक ज़रूरतों के अनुरूप पाठ्यक्रमों का पुनर्निर्माण हुआहै जिससे अब स्पष्ट हो गया है कि पुनऺकल्पित उच्च शिक्षा ही आत्मनिर्भर, जागरूक और जिम्मेदार नागरिक तैयार कर सकती है।
जैसे-जैसे भारत विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण की ओर अग्रसर हो रहा है, उच्च शिक्षा पारितंत्र एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जहाँ मात्रात्मक विस्तार तो प्राप्त कर लिया गया है, किंतु गुणवत्ता की समानता अब भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी तथा तीव्र गति से बढ़ते नामांकन के संदर्भ में विश्वविद्यालय अब केवल शिक्षण के केंद्र नहीं रहे, बल्कि नवाचार, सामाजिक गतिशीलता तथा राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता के प्रमुख आधार बनते जा रहे हैं। हालांकि, यदि संस्थागत क्षमता के अनुरूप संरचनात्मक विस्तार नहीं किया गया, तो यह स्थिति क्षमता निर्माण के स्थान पर केवल प्रमाण-पत्रों की वृद्धि तक सीमित रह सकती है। अतः जनसांख्यिकीय लाभांश को वास्तविक विकासात्मक परिणामों में रूपांतरित करने के लिये शासन व्यवस्था, शिक्षण-पद्धति तथा अनुसंधान के क्षेत्रों में गहन और सुविचारित द्वितीय-पीढ़ी के सुधार अपरिहार्य हो जाते हैं।
भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप विषयगत संस्थानों बजाय बहु विषयक एवं अनुसंधान-केंद्रित विश्वविद्यालयों को महत्व दिया जा रहा है। यह परिवर्तन समस्या समाधान क्षमता को सुदृढ़ करता है, विभिन्न विषयों में नवाचार को प्रोत्साहित करता है तथा स्नातकों की रोज़गारयोग्यता में वृद्धि करता है। लक्षित वित्तपोषण और परिणाम-आधारित सुधार यह संकेत देते हैं कि नीतिगत-दृष्टिकोण अब मात्र विस्तार से आगे बढ़कर संस्थागत उत्कृष्टता पर केंद्रित हो रही है।
उदाहरणस्वरूप, पीएम-उषा योजना के अंतर्गत 600 से अधिक परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है, जिनमें 35 चयनित राज्य विश्वविद्यालयों को बहु विषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करने हेतु लगभग 100 करोड़ रुपये प्रति संस्थान का अनुदान प्रदान किया गया है, जिससे बहुविषयक परिवर्तन और अनुसंधान क्षमता निर्माण को बल मिला है। भारत उच्च शिक्षा क्षेत्र में एकीकृत एवं एकल नियामक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जिसके अंतर्गत यूजीसी, एआईसीटीई तथा एनसीटीई जैसे बहु-स्तरीय निकायों द्वारा की जा रही विखंडित निगरानी को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भावना के अनुरूप है। भारत एक सशक्त अनुसंधान कार्यबल के निर्माण हेतु डॉक्टोरल शिक्षा तथा प्रतिस्पर्धी फेलोशिप कार्यक्रमों का सक्रिय रूप से विस्तार कर रहा है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा डिजिटल प्रौद्योगिकियों को पाठ्यक्रम, शिक्षण-पद्धति एवं संस्थागत शासन में समाहित किया जा रहा है, जिससे विद्यार्थियों को भविष्य-उन्मुख कौशल प्रदान किये जा सकें। उच्च शिक्षा सुधारों के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणालियों को मुख्यधारा के विषयों में सम्मिलित किया जा रहा है। एक राष्ट्र, एक सदस्य + पहल के माध्यम से सरकार ने शोध पत्रिकाओं की सदस्यता को केंद्रीकृत कर दिया है, जिससे छोटे एवं राज्य-पोषित विश्वविद्यालयों में अनुसंधान की वित्तीय बाधाएँ दूर हो रही हैं। एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट तथा बहु-प्रवेश-बहु-निर्गमन व्यवस्था आजीवन अधिगम और शिक्षार्थी गतिशीलता को संस्थागत रूप प्रदान कर रही हैं। भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली का स्वरूप अब विद्यार्थी गतिशीलता, संयुक्त अनुसंधान और संस्थागत साझेदारियों के माध्यम से अधिक वैश्विक होती जा रही है। विद्यार्थी कल्याण को अब शैक्षणिक सफलता तथा संस्थागत गुणवत्ता का अनिवार्य घटक माना जा रहा है।
उच्च शिक्षा संस्थानों में परामर्श, मार्गदर्शन तथा तनाव-प्रबंधन प्रणालियों को अकादमिक नियोजन का अभिन्न अंग बनाया जा रहा है। भारत के अनेक विश्वविद्यालय आज डिग्री उत्पादन केंद्र के रूप में कार्य कर रहे हैं, जहाँ व्यावहारिक कौशल अर्जन की तुलना में सैद्धांतिक एवं पारंपरिक अधिगम को प्राथमिकता दी जाती है। इसके परिणामस्वरूप एक ऐसा कार्यबल तैयार हो रहा है जो प्रमाण-पत्रों से युक्त तो है, किंतु व्यावसायिक रूप से सक्षम नहीं है। भारत की उच्च शिक्षा यात्रा अब केवल विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें समावेशन एवं उत्कृष्टता की भी माँग है। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य तभी साकार होगा जब विश्वविद्यालय स्वायत्त रूप से कार्य कर सकेंगे, निर्भीक नवाचार करेंगे तथा बड़े पैमाने पर रोजगारोन्मुख ज्ञान प्रदान करेंगे। द्वितीय-पीढ़ी के सुधारों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों को मात्र डिग्री प्रदान करने वाले केंद्रों से बदलकर अनुसंधान, कौशल एवं सामाजिक गतिशीलता के सशक्त इंजन बनाना होना चाहिये। तभी भारत अपनी जनसांख्यिकीय लाभांश को दीर्घकालिक विकासात्मक लाभ में रूपांतरित कर सकेगा।