रीवा । समशेर सिंह गहरवार। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर परम पावन दलाई लामा को 10 दिसंबर सन 1989 में शांति के लिए मिले नोबेल पुरस्कार सम्मान की 35 वी वर्षगांठ के उपलक्ष्य पर स्थानीय पूनम जन्मासा नेहरू नगर में समता संपर्क अभियान, भारत तिब्बत मैत्री संघ, नारी चेतना मंच, विंध्यांचल जन आंदोलन एवं समाजवादी कार्यकर्ता समूह के संयुक्त तत्वावधान में गीता महंत की अध्यक्षता में तिब्बत की आजादी और भारत की सुरक्षा के सवाल पर विचारोत्तेजक चर्चा संपन्न हुई। 
कार्यक्रम को प्रमुख रूप से संबोधित करते हुए भारत तिब्बत मैत्री संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष समता संपर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने बताया कि नोबेल पुरस्कार विजेता तिब्बती आध्यात्मिक नेता परम पावन दलाई लामा लंबे समय से भारत में हजारों तिब्बतियों के साथ निर्वासित जीवन बिता रहे हैं।
भारत में उनके स्वागत और सम्मान में कोई कमी नहीं है लेकिन यह भारी विडंबना है कि तिब्बत की आजादी के सवाल पर कोई ठोस पहल नहीं हो पा रही है। तिब्बत को हड़पने के बाद साम्राज्यवादी चीन के विस्तारवादी हथकंडे भारतीय सीमाओं के लिए लगातार खतरा बने हुए हैं। चीन के द्वारा भारत का एक बड़ा भूभाग हथिया लिया गया है लेकिन उसे वापस लेने का 14 नवंबर 1962 का संसदीय संकल्प आज भी ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। खरे ने कहा कि 20 वीं सदी के मध्य तक तिब्बत आजाद था तब तक भारत की उतरी सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित थीं लेकिन तिब्बत को हड़पने के बाद चीन आए दिन भारतीय सीमाओं पर घुसपैठ करता रहता है। खरे ने बताया कि तिब्बत भारत का पड़ोसी देश रहा है , ना कि चीन। तिब्बत की आजादी का सवाल पूरी दुनिया के स्वतंत्रता के पक्षधरों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
जब दुनिया के अधिकांश देश गुलामी से मुक्त हो रहे थे तब चीन के द्वारा आजाद तिब्बत को गुलाम बना लिया जाना बहुत कष्टप्रद प्रसंग है। खरे ने कहा कि तिब्बत मुक्ति साधना के काम को आसान बनाने के लिए विश्व जनमत की पहल बेहद जरूरी है। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से रमाशंकर शुक्ला, ओमप्रकाश द्विवेदी अशोक सोनी , उद्धव द्विवेदी, परिवर्तन पटेल के अलावा जावरा रतलाम से हितेश रावत , विशाल , कृष्ण पाल , संदीप वाचला, अंकित लोढ़ा की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।