नई दिल्ली। न्यूज डेस्क। “रेड वॉर” किताब नक्सली दुनिया का ऐसा दस्तावेज है जिसमें बेबस,उत्पीड़न के शिकार आदिवासियों के दर्द के साक्ष्य हैं। किताब बताती है कि आखिर नक्सलवाद भेष बदल कर क्यों आया है? इसके पीछे वजह क्या है। और सरकार क्यों नहीं चाहती कि नक्सलवाद खत्म हो जाए। आखिर नक्सलियों की यारी नेताओं से और अर्बन नक्सलियों से क्यों है। ब्रस्तर में अंधा युग क्यों है। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने ऐसा क्यों कहा, कि भूपेश सरकार के समय नक्सली कहते थे कि हमारी सरकार बन गयी। राजबब्बर छत्तीसगढ़ में ऐसा क्यो कह गए, कि नक्सली क्रांतिकारी हैं। उन्हें कोई रोको नहीं। क्या डॉ रमन सिंह की सरकार गिराने में नक्सलियों का हाथ था। नक्सली आखिर किस पार्टी के दोस्त हैं। जंगल सरकार की नर्सरी क्यों चल रही है? माओ की मुट्टी में झारखंड क्यों है। सियासत की खूंटी पर नक्सलवाद कब तक लटका रहेगा। प्रशासन बार बार क्यों कहता है माओवाद बुरे दौर में है। सरेडर पॉलिसी एक सी क्यों नहीं है। कौन मंत्री नक्सलियों से जुड़ा था। किसने विधायक को मारने के लिए एक करोड़ रुपए दिये। अब हंट नहीं हंटर चाहिए मीडिया के कहने के बाद भी एम.पी में नक्सली क्यों पांव पसार रहे हैं। पूर्व नक्सली कमांडर ने ऐसा क्यो कहा, कि क्रांति आएगी,मगर देर से। आखिर नक्सलियों के तार विदेशों तक कैसे है। नक्सलियों का लाल गलियारा है,मगर और किनका गलियारा है। रहस्य के लिफाफे सें झीरम कांड का सच क्यो नहीं आया। नक्सलियों ने संसद में लाल सलाम कहने का लक्ष्य कब तक का तय कर रखा है। किसने लिख दिया बस्तर की पीठ पर खून। ऐसे कई सवाल हैं जिनका गहन शोध कर लिखी गया है “रेड वॉर” ।
देश के कई संपादकों ने “रेड वॉर” पर क्या कहे एक नजर उस पर-
▪️ “रेड वॉर” उन आदिवासियों की बात करती है,जो सदियों से मुख्य धारा से कट कर जीते रहे और दूसरों के हाथों की कठपुतलियां बनते रहे। “रेड वॉर” में इतिहास और तमाम घटनाओं के हवाले से नक्सलवाद की वह तस्वीर खींची गई है,जिसकी सच्चाई सालों से नहीं आई है। अगर पश्चिम बंगाल से नक्सलवाद मिट सकता है]तो छत्तीसगढ़ से क्यों नहीं? यह किताब विचारोत्तेजक और दिलचस्प है।
जयंती रंगनाथन, एक्जीक्यूटिव एडिटर,हिंदुस्तान, नई दिल्ली
▪️यह बहुत सुखद है,कि इस दौर में इतिहास और साहित्य एक दूसरे के साथ बहुत रचनात्मक ढंग से सहमेल साधे हुए हैं। इस सहमेल का उत्कृष्ट उदाहरण है “रेड वॉर”। बस्तर पर अनेक पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं, राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और सामाजिक आंदोलनों आदि की दृष्टि से, मगर रमेश “रिपु” ने जिस गहन शोध और संवेदना के साथ बस्तर की वेदना को उकेरा है, वह एक त्रासद औपन्यासिक वितान बन गया है। इसे इतिहास की तरह भी पढ़ा जा सकता है, उपन्यास की तरह भी। सामाजिक आंदोलनों की गूंज तो इसमें है ही।
सूर्यनाथसिंह,जनसत्ता,एसोसियेट एडिटर नई दिल्ली
▪️समस्या कोई भी हो,जब तक उस पर विचार विमर्श नहीं होगा,तब तक उसके समाधान का रास्ता नहीं निकल सकता। छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी समस्या पर इस किताब के जरिए विचारोत्तेजक बहस शुरू करने का प्रयास किया गया है। ऐसी उम्मीद जरूर की जानी चाहिए,कि देश का प्रबुद्ध वर्ग इसी प्रकार अपनी राय समाज के सामने रखे,ताकि हमें कोई रास्ता तो नजर आए। समाधान खोजने की दिशा में यह किताब प्रेरक साबित होगी। ऐसी उम्मीद भी हमें करनी चाहिए।
शिव दुबे,राज्य संपादक,दैनिक भास्कर,छत्तीसगढ़
▪️छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और झारखंड के कुछ जिले नक्सलवाद और उसकी विद्रूपता को झेल रहे हैं। हिंसा के कारण वहाँ विकास भी अवरुध्द है। पत्रकार रमेश कुमार “रिपु” ने अपनी पुस्तक 'रेड वॉर' में इस समस्या पर गम्भीर चिंतन किया है और शोध करके नक्सल समस्या से जुड़े आँकड़े भी प्रस्तुत किए हैं। कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं। कुछ राजनीतिक, प्रशासनिक और दलीय लोगों से उन्होंने सीधा संवाद भी किया है। निःसन्देह बढ़ते माओवाद को लेकर देश चिंतित है। यह चिंता लेखक पत्रकार रिपु में दृष्टव्य होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक नक्सल समस्या पर एक बार फिर गम्भीर विमर्श का सकारात्मक वातावरण बनाएगी।
प्रो. संजय द्विवेदी, पूर्व महानिदेशक, भारतीय जनसंचार संस्थान,नई दिल्ली
▪️“रेड वॉर” में नक्सल समस्या और उसके प्रभावों का बारीकी से जिक्र है। इस समस्या के उन्मूलन के लिए किताब बताती है,कि सरकारी स्तर पर ठोस इच्छाशक्ति जरूरी है। लेकिन अब तक की सरकारों में इसकी कमी दिखती रही है। यह समस्या गरीबी और अशिक्षा से जुड़ी है। अगर नक्सलियों के प्रभाव को खत्म करना है तो उसके लिए नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गति बढ़ाने के साथ ही समानांतर रूप से नक्सलियों पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई करनी होगी।
जिनेश जैन,एसोसिएट एडिटर राजस्थान पत्रिका,जयपुर
▪️नक्सल समय,समग्र समस्या और समाधान की संभावनाओं का जीवंत चित्र है“रेड वॉर” । आम धारणाओं को दरकिनार करती तटस्थ तारीख है “रेड वॉर” । लेखक ने “रेड वॉर में अपनी बात को एक फिल्मी रील की तरह कहा है। हर पैरे में नई बात और नए सवाल है]जिनका बखूबी जवाब खोजने का प्रयास भी। बस्तर की विद्रुपताओं का खाका खींचती है। सरकारी डीपीआर के नगाड़ों के शोर को चीरती हुई हकीकत को बयां करती है। झीरम जैसी घटना और उसके पीछे की सियासत पर भी “रेड वॉर” जमकर प्रहार करती है।
बरुण सखाजी,सह संपादक आईबीसी 24 छत्तीसगढ़
▪️“रेड वॉर” में बस्तर की पीठ पर लिखा है ”खून“ छत्तीसगढ़ के लिए ही नहीं] पूरे देश के लिए संग्रहणीय और जानकारी मूलक है। बस्तर के इतिहास से लेकर वर्तमान तक खून के आंसुओं का तथ्य से सत्य तक का “रेड वॉर” प्रमाणिक दस्तावेज है। नक्सलवाद पर यह किताब बारीकी से बात करती है।
मनोज शर्मा,संपादक लोकस्वर,बिलासपुर छत्तीसगढ़
▪️छत्तीसगढ़ से ले कर झारखण्ड तक पसरे नक्सलवाद पर वैसे तो अनेक पुस्तकें आई हैं]लेकिन “रेड वॉर सर्वाधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक है। इन्होंने बस्तर के सच को बेबाक ढंग से प्रस्तुत करने का साहस किया है। नक्सलवाद को लेखक ने बस्तर का अंधा युग कहा है। यह सटीक टिप्पणी है। नक्सलियों के बर्बर अत्याचार और प्रशासनिक उदासीनता आदि का सम्यक विवेचन है“रेड वॉर”। नक्सलवाद पर विश्वसनीय
गिरीश पंकज,वरिष्ठ साहित्यकार छत्तीसगढ़, रायपुर