नागपुर । एड अब्दुल अमानी कुरैशी। नाईक तालाब बंगलादेश स्थित संत कबीर स्कुल का वार्षिक स्नेह सम्मेलन (सोशल गैदरिंग) का आयोजन स्कुल मैदान में किया गया। शुरूवात स्वच्छता अभियान से हुई। विदयार्थीयो द्वारा बनाए गये माडेल्स विज्ञान प्रदर्शनी, क्रीड़ा स्पर्धा भाषण व वक्तृत्व स्पर्धा के अलावा डांस,गायन, नाटक प्रतियोगिताएं इस आयोजन का हिस्सा है ।
प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक तथा माध्यमिक ऐसे दो अलग-अलग ग्रुप में छात्र -छात्राएं अपना प्रस्तुतीकरण पेश किए।
कार्यक्रम समन्वयक तथा स्कूल मुख्याध्यापिका आरती गोखले ने बताया कि २३ से २५ जनवरी तक विभिन्न आयोजन होंगे। जिसमे शैक्षणिक, सांस्कृतिक व क्रीड़ा स्पर्धाए होगी।संत कबीर स्कुल के संस्था प्रमुख जगरामजी हेडाऊ के मार्गदर्शन में उपरोक्त कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।
उद्घाटन समारोह में प्रमुख रूप से दीपराज पारडीकर, शिवशंकर रणदिवे,रवि पराते, एड.अब्दुल अमानी कुरैशी, रमेश पुणेकर,
वस्ताद चंदुविणेकर,बालकदास हेडाऊ, हरिचंद नाईक, गौरव नहाले,उज्ज्वला ताई शेंडे, सोनटक्के मैडम(केन्द्र प्रमुख)
विशेष रूप से मंच उपस्थित थे।
कार्यक्रम का प्रारंभ-दिप प्रज्वलित करके शुरू कीया गया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद मंच पर आसीन अतिथियों ने समयोचित विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वस्ताद चंदुविणेकर ने कहा कि, शिक्षको द्वारा विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने से माडेल्स बनाने में विद्यार्थियों की रुचि बढ़ी है। यह देखकर हर्ष होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न करने तथा दैनिक जीवन में विज्ञान से संबंधित पोस्टर एवं मॉडल को प्रदर्शित किये जाने से विद्यार्थीयो मे विश्वास बढ़ता है।
उन्होंने स्कूल प्रबंधन की सराहना की।
कक्षा पहली से बारहवीं तक पढ़ रहे यहां के विद्यार्थियों में विकसित होने वाली निष्पक्षता, ईमानदारी, साहस की भावना को परिष्कृत करती है।' अपने समय के महान - चिंतक दार्शनिक सुकरात ने कहा था कि मैं - शिक्षित अथवा ज्ञानी इस अर्थ में हूं, कि मैं कुछ - नहीं जानता। शिक्षा व्यक्ति के जीवन में - अहंकार, लालच, हिंसा, कटुता आदि को - नियंत्रित करने में मदद देती है। पुराण काल में रावण प्रकांड पंडित एवं साक्षर व्यक्ति माना जाता था पर स्त्री के अपहरण में उसका कृत्य अहंकार लालच लिप्सा उसकी साक्षरता को सार्थक नहीं कर पाई। पर आज के संदर्भ में जब आज का युग प्रतिस्पर्धा का युग है।
साक्षरता ने शिक्षा की जगह वरीयता प्राप्त करना शुरू कर दिया है,तो यह माना जाता है जिस व्यक्ति के पास अच्छी नौकरी अच्छा पद और मोटी मोटी तनख्वाह है, उसका समाज ज्यादा ही सम्मान करने लगता है। इन्हीं कारणों से सामाजिक मूल्यों तथा संस्कृति के विकास - को दरकिनार कर रोजगार मूलक साक्षरता को ही - आज वरीयता देता है। और समाज उसे सिर आंखों पर बिठा के रखता है। परंतु यह पुरा सत्य नहीं है। वास्तव में शिक्षा मानसिक रुप से सशक्त नैतिकता,और कर्म प्रधान बनाने का एक जरिया है।
मंच संचालन गिता हेडाऊ ने किया , प्रस्ताविक भाषण प्रकाश हेडाऊ तथा आभार प्रदर्शन श्रीप्रकाश गोखले ने व्यक्त किया।