मुंबई | हस्तरेखा तज्ञ विनोद जी | आज षटतिला एकादशी है। सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अत्यधिक महत्व है। माघ माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को षटतिला एकादशी कहते हैं। इस वर्ष यह एकादशी आज शुक्रवार के दिन पड़ी है इसलिए इस व्रत से ना सिर्फ भगवान विष्णु का आशीष प्राप्त होगा बल्कि महालक्ष्मी की भी कृपा होगी, क्योंकि शुक्रवार के दिन व्रत करने से महालक्ष्मी का व्रत स्वत: हो जाएगा।
षटतिला एकादशी के महात्म के बारे में जानकारी देते हुए वेदाचार्य पंडित रमेश चंद्र त्रिपाठी बताते हैं की चूंकि सूर्य उत्तरायण है और और मकर राशि में है इसलिए इस एकादशी को व्रत के साथ-साथ भगवान को तिल का का भोग लगाना चाहिए, इस दिन तिल का दान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। अपने प्रसाद में भी तिल की सामग्री का सेवन करना चाहिए। इस दिन चावल का त्याग करना चाहिए।
इस्कॉन धनबाद के नाम प्रेमदास बताते हैं की षटतिला एकादशी के दिन व्रत रखकर घर पर हरिनाम संकीर्तन करना चाहिए। यही एक व्रत है जो मनुष्य को मोक्ष के द्वार तक ले जाती है।
षटतिला एकादशी शुभ मुहूर्त-
षटतिला एकादशी 2022 पूजन मुहूर्त 2 घंटे 9 मिनट का रहेगा। 28 जनवरी को सुबह 07 बजकर 11 मिनट से 09 बजकर 20 मिनट तक पूजन का शुभ समय है।
षटतिला व्रत का महत्व-
खंडेश्वरी मंदिर के पुजारी राकेश पांडे षटतिला एकादशी की कथा पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि की वस्तुत: एकादशी तो मोक्ष का व्रत है लेकिन विशेषकर षटतिला एकादशी पूजन और दान का व्रत है। क्योंकि इस दिन किया गया दान न सिर्फ भौतिक जीवन में अपितु बैकुंठ में भी वैभव से परिपूर्ण करता है।
षटतिला एकादशी के दिन तिल के प्रयोग का खास महत्व होता है। कहते हैं कि इस दिन तिल का 6 तरह स्नान, उबटन, तर्पण, दान, सेवन और आहुति से पापों का नाश होता है।
षटतिला एकादशी व्रत पूजा विधि-
- इस दिन व्रती को सुबह जल्दी उठना चाहिए और स्नान करना चाहिए।
- इसके बाद पूजा स्थल को साफ करना चाहिए। अब भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण की मूर्ति, प्रतिमा या उनके चित्र को स्थापित करना चाहिए।
- भक्तों को विधि-विधान से पूजा अर्चना करनी चाहिए।
- पूजा के दौरान भगवान कृष्ण के भजन और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए।
- प्रसाद, तुलसी जल, फल, नारियल, अगरबत्ती और फूल देवताओं को अर्पित करने चाहिए।
- अगली सुबह यानि द्वादशी पर पूजा के बाद भोजन का सेवन करने के बाद षट्तिला एकादशी व्रत का पारण करना चाहिए।
एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक महिला के खूब संपत्ति थी। वह गरीब लोगों को बहुत दान करती थी। वह जरूरतमंदों को बहुत ज्यादा दान देती थी। वह उन्हें बहुमूल्य सामान, कपड़े और बहुत सारे पैसे बांटती थी। लेकिन गरीबों को कभी भी भोजन नहीं देती थी। यह माना जाता है कि सभी उपहार और दान के बीच, सबसे महत्वपूर्ण भोजन का दान होता है क्योंकि यह दान करने वाले व्यक्ति को महान गुण प्रदान करता है।
यह देखकर, भगवान कृष्ण ने उस महिला को यह बताने का फैसला किया। वह उस महिला के सामने भिखारी के रूप में प्रकट हुआ और भोजन मांगा। लेकिन उस महिला ने दान में भोजन देने से इनकार कर दिया और भगवान को गरीब समझकर भगा दिया।
महिला के अनुरोध को सुनकर, भगवान कृष्ण उसके सपनों में प्रकट हुए और उसे उस दिन की याद दिलाई जब उसने उस भिखारी को भगा दिया था और जिस तरह से उसने अपने कटोरे में भोजन के बजाय मिट्टी डालकर उसका अपमान किया था। भगवान कृष्ण ने उसे समझाया कि इस तरह के काम करने से उसने अपने दुर्भाग्य को आमंत्रित किया और इस कारण ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं।
उसे षट्तिला एकादशी के दिन गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन दान करने की सलाह दी और व्रत रखने को भी कहा। महिला ने एक व्रत का पालन किया और साथ ही जरूरतमंद और गरीबों को बहुत सारा भोजन दान किया और इसके परिणामस्वरूप उसे सभी सुखों की प्राप्ति हुई।