नई दिल्ली | गुरमीत सिंह | " जय जवान जय किसान " क्या यह नारा अब भारत में नहीं बोला जायेगा , क्या इस नारे को ख़त्म कर दिया जायेगा , क्या आने वाली हमारी पीढ़ी इस नारे को नहीं बोल पायेगी | नए कृषि कानून के खिलाफ पिछले दो महीनों से देश में चल रहे किसान आंदोलन ने पिछले 20 दिनों से दिल्ली में डेरा डाला तो सरकार ने जवानों से किसानों को पिटवाया जा रहा था | जिस तरह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के मंत्रियो और प्रतिनिधियों के बयान देश के किसानों को देश द्रोही बता रहें हैं , वो ये भूल रहें हैं के किसानों के ही बेटे सरहद पर देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी भी लगाते हैं | सिंघु बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन में एक फौजी भाई ने देश के किसानों को समर्थन देते हुए कहा " मेरे पिता किसान हैं अगर वो देश द्रोही हैं तो मैं भी देश द्रोही हूँ " | यह घटना अपने आप में शर्म महसूस करने वाली है , सर झुकाने वाली है |
किसान आंदोलन में भाग ले रहे किसाओं पर जिन फौजियों ने लाठियां बरसाई , आंसू गैस के गोले छोड़े, ठण्ड में पानी की बौछारों से भिगोया उन्ही किसानों ने उन्हें आदर और सम्मान के साथ खाना खिलाया और पानी भी पिलाया | भारत देश के दो मजबूत स्तम्भ हैं जवान और किसान अगर ये दोनों ही आपस में लड़ मरेंगे तो देश का क्या हाल होगा ये सोच कर ही रूह कांप जाती हैं | आज एक फौजी ने किसान पिता के हक़ में आवाज़ उठाई है कल अगर इनकी तादाद बढ़ती है तो कोई हैरानी नहीं लेकिन क्या ये देश हिट में होगा | अगर देखा जाए तो देश की आधी से ज्यादा सेना के जवान या अधिकारी कृषिक परिवार से नाता रखते होंगे | क्या भारत में सेना किसानों के पक्ष में खुल कर सरकार का विरोध करेगी अगर ऐसा होगा तो यह देश के भविष्य के लिए एक प्रश्न चिन्ह होगा | क्या सरकार को किसानों की मांगो पर गौर नहीं करना चाहिए | बातचीत से हल निकल सकता , थोड़ा सरकार आगे बढे थोड़ा किसान यही देश हित में होगा | @ गुरमीत सिंह