मुंबई | हस्तरेखा तज्ञ विनोद जी | इस साल होली का त्यौहार 17 मार्च दिन गुरुवार को मनाया जाएगा। यद्यपि उस दिन 1:30 बजे तक चतुर्दशी तिथि है, लेकिन उसके बाद पूर्णिमा तिथि आएगी। पूर्णिमा में ही होलिका दहन होता है। अगले दिन शाम को पूर्णिमा का अभाव रहेगा। इसलिए 17 मार्च को ही होलिका दहन होगा। 17 मार्च को होलिकोत्सव के दिन माताएं अपने संतान की लंबी आयु और स्वास्थ्य की कामना से होलिका पूजन करती हैं। ऐसा मानना है कि होलिका उनकी सन्तान को कुदृष्टि और दुर्घटना से बचाती हैं।
होलिका पूजन हमेशा मध्यान्ह और अपराह्न काल में होता है। 17 मार्च 2022 प्रातः 11:36 बजे से 12:24 बजे तक 48 मिनट अभिजीत मुहूर्त रहेगा। यह होलिका पूजन का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है। इसके पश्चात 1:30 बजे से पूर्व ही होलिका पूजन करना चाहिए क्योंकि 1:30 से 3:00 तक राहुकाल रहेगा। राहु काल में होलिका पूजन शुभ नहीं होता है और 3:00 बजे के बाद दिन का चतुर्थ प्रहर प्रारंभ होता है जो होलिका पूजन के लिए अच्छा नहीं माना गया। होलिका दहन रात्रि 21:05 से 22:15 तुला लग्न में सर्वश्रेष्ठ रहेगा।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार होलिका प्रह्लाद की बुआ थी। अपने भाई हिरण्यकश्यप के कहने से वह प्रह्लाद को मारने के लिए उसे लेकर अग्नि बैठ गई थी लेकिन उसको अग्नि में बैठते ही उसका विचार परिवर्तन हो गया। जो दिव्य वस्त्र उसके पास था जिससे वह अग्नि में जल नहीं सकती थी। उसने यह विचार किया मेरा जन्म तो इस राक्षसी कुल में होकर व्यर्थ हो गया। मैं अंतिम समय में ऐसा पाप नहीं करूंगी कि अपने भाई से भी प्यारे भतीजे को अग्नि में भस्म कर दूं। ऐसा विचार कर उसने अपने दिव्य वस्त्र से प्रह्लाद को ढक दिया और स्वयं जलकर राख हो गई। अर्थात उसने स्वयं जलकर अपने भाई के पुत्र को बचा लिया।
यह सकारात्मक तथ्य बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन होलिका पूजन का शास्त्रीय महत्व यही है कि होलिका पूजन से पुत्र संतान के कष्टों का निवारण होता है। 18 मार्च को रंगोत्सव का त्यौहार अर्थात दुल्हैण्डी पर्व मनाया जाएगा। प्रातः 10:30 बजे के बाद और दोपहर 2:00 बजे तक होली का पर्व रंगोत्सव मनाया जाएगा। यह त्यौहार पारस्परिक मतभेद को भुलाकर मनाना चाहिए। होली का त्यौहार नवान्नेष्टि के रूप में भी मनाया जाता है। अर्थात कृषि प्रधान भारत देश में इन दिनों रबी की फसल जो भारत की मुख्य फसल है वह पकनी आरंभ हो जाती है।
इस खुशी में किसान लोग होलिका दहन में गेहूं की बाल भूनकर परस्पर बांटते हैं और अच्छी फसल होने की कामना करते हैं। नव +अन्न-+ इष्टि अर्थात नए अनाज के आने की कामना को पूर्ण करने के लिए यह त्यौहार माना गया है। इस दिन घरों में यज्ञ एवं हवन का भी आयोजन करना चाहिए ताकि होलाष्टक से चले आ रहे प्रकृति के दोष दूर हो सकें।