मुंबई | हस्तरेखा तज्ञ विनोद जी | माघ मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। बसंत पंचमी के दिन से ही बसंत ऋतु का आगमन माना जाता है। मान्यता है कि बसंत पंचमी के ही दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी। इस दिवस को माता सरस्वती के प्राकट्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विशेष रूप से माता सरस्वती की पूजा उपासना कर उनसे विद्या बुद्धि प्राप्ति की कामना की जाती है।
बसंत पंचमी को नई विद्या आरंभ करना, नया काम शुरू करना, बच्चों का मुंडन संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार, गृह प्रवेश या अन्य कोई शुभ काम करना अच्छा माना जाता है। इस दिन स्नान आदि से निवृत्त होकर मां सरस्वती को पीले रंग के फूल अर्पित करें। मां सरस्वती को सफेद वस्त्र धारण कराएं। मां सरस्वती का शृंगार करें। माता के चरणों पर गुलाल अर्पित करें। मां सरस्वती को पीले फल या फिर मौसमी फलों के साथ बूंदी का प्रसाद अर्पित करें।
पूजा के समय पुस्तकें या फिर वाद्ययंत्रों का भी पूजन करें। बसंत पंचमी के दिन किसी को अपशब्द न बोलें। इस दिन पितृ तर्पण करना चाहिए। बसंत पंचमी के दिन पेड़-पौधे नहीं काटने चाहिए। इस दिन सरस्वती स्त्रोत का पाठ अवश्य करें।
विद्यार्थियों के लिए बसंत पंचमी का विशेष महत्व है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने और खिचड़ी बनाने और वितरित करने का प्रचलन है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार बसंत पंचमी पर प्रातः 7:11 बजे के बाद मध्याह्न तक कभी भी माता सरस्वती की पूजा की जा सकती है। बसंत पंचमी से बसंतोत्सव आरंभ होता है। बसंतोत्सव होली तक रहता है।