July 05, 2024

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भारत-सोवियत मित्रता का प्रतीक मैत्री स्तंभ चौराहे का उन्नयन

पूरे एशिया का सबसे बड़ा इस्पात संयंत्र


भिलाई । मिनल केडेकर । सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र के मेन गेट के सामने चौराहे, जिसमें भारत और सोवियत संघ की मित्रता और सहयोग के स्मारक-स्तंभ स्थापित है का सौंदर्यीकरण एवं चौराहे का उन्नयन बीएसपी प्रबंधन द्वारा किया जा रहा है। इस चौराहे के घेरे को सभी तरफ से 1.5 मीटर घटाई जायेगी, इससे आवागमन सुगम होने के साथ-साथ दुर्घटना की आशंकाएं भी न्यूनतम हो जायेगी। इस स्मारक-स्तंभ के चारों तरफ चौराहे की चौड़ाई को कुल 3 मीटर कम की जायेगी। संयंत्र के मुख्य गेट के सामने होने के कारण इसका अनुरक्षण और सौंदर्यीकरण किया जाना प्रस्तावित था, जिसका कार्य 04 जुलाई 2024 से प्रारंभ हो चुका है। 

इस स्मारक-स्तंभ के चारों तरफ लगे लोहे की रेलिंग को हटाया जायेगा और फूलों की लगी क्यारियों का भी सौंदर्यीकरण किया जायेगा। इनकी सुंदरता बढ़ाने के लिए आवश्यक रंग-रोगन किया जायेगा। इस कायाकल्प के अंतर्गत सड़क सुरक्षा हेतु चौराहे के आसपास की डैमेज हो चुकी सड़कों की मरम्मत और रिकारपेटिंग के कार्य किया जायेगा। इसके चारों ओर फेन्सिंग के अंदर आकर्षक पौधे रोपे जायेंगे एवं फूलों की क्यारियों को भी सजाया जायेगा। इस कायाकल्प से इसे और भी आकर्षक स्वरूप दिया जा रहा है। भिलाई इस्पात संयंत्र, इस्पात नगरी के सौंदर्यीकरण के लिए इन दिनों कई परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है। इन परियोजनाओं के तहत, सड़कों की मरम्मत एवं चौकों के जीर्णोद्धार का कार्य किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि भिलाई इस्पात संयंत्र शहर के सौंदर्यीकरण और अपनी टाउनशिप को साफ, स्वच्छ और सुंदर बनाए रखने के लिए निरन्तर प्रयास करता रहता है।

वैसे तो भिलाई स्वयं अपने आप में भारत- सोवियत संघ की मित्रता का प्रतीक है लेकिन यहां कई ऐसे स्मारक हैं, जिन्हें दोनों देशों की दोस्ती की यादगार के तौर पर बनाया गया था। ऐसे स्मारकों में सबसे पहले और एकमात्र प्रतीक स्तंभ (ओबेलिस्क) की आधारशिला 26 फरवरी 1961 को भिलाई दौरे पर आए सोवियत संघ मंत्रिपरिषद के उपाध्यक्ष  अलेक्सेई निकोलाई कोसिजिन ने रखी थी। कोसिजिन ने भिलाई इस्पात संयंत्र के मेनगेट के सामने, भारत-रूस मैत्री के प्रतीक स्तंभ (ओबेलिस्क) की आधारशिला रखी थी। इस दौरान, सोवियत संघ के विदेश

आर्थिक मामलों की समिति के अध्यक्ष एस ए स्कचकोव, भारत में सोवियत संघ के राजदूत एस दत्त, भिलाई इस्पात संयंत्र के चीफ इंजीनियर पुरतेज सिंह और एक्जीक्युटिव इंजीनियर तरचंद हेमचंद वाच्छानी सहित कई प्रमुख लोग मौजूद थे। यह स्मारक साल भर में बन कर तैयार हुआ और इसका लोकार्पण 23 फरवरी 1962 को भारत में सोवियत संघ के राजदूत  अलेक्सांद्रोविच बेनेडिक्टोव ने किया था।